शिवम भारद्वाज

आखिर कौन था वह गुरिल्ला विद्रोही जिसने 20 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अमेरिकी साम्राज्यवाद की चूलें हिला दी थीं? अमेरिकी पूंजीवाद को किस व्यक्ति का डरावना सपना आता था कि वह आतंकवादी-आतंकवादी चिल्लाने लगता था?

कौन है वह व्यक्ति जिसने चेहरे पर घनी दाढ़ी रखी है जो किसी फौजी के अंदाज में टोपी पहने है और मुंह में क्यूबन सिगार दबाए हैं? जिसके फ़ोटो एक फैशन आइकॉन के रूप में टी शर्ट से लेकर कई तरह के उत्पादों पर दिखायी देते हैं, जिन टी – शर्ट को कई बार युवा उस व्यक्ति को जाने बिना कूल-ड्यूड दिखने के लिये पहन लेते हैं, और पूँजीवाद जिसकी लोकप्रियता और लुक को मुनाफ़े में बदलने में बिल्कुल शर्म महसूस नहीं करता?

लैटिन अमेरिका का भगतसिंह कौन है?सारे सवालों का जवाब है-चे ग्वेरा

आज चे ग्वेरा का जन्मदिन है। अर्नेस्टो चे ग्वेरा का जन्म 14 जून 1929 को रोजारियो,अर्जेंटीना में हुआ था। अर्नेस्टो चे ग्वेरा अर्जेंटीना के मार्क्सवादी क्रांतिकारी थे। इसके अलावा चे एक डॉक्टर, लेखक, गोरिल्ला नेता, सामरिक सिद्धांतकार और कूटनीतिज्ञ थे। पहले चे का नाम अर्नेस्टो ग्वेरा था। क्यूबा की क्रांति के संघर्ष के दौरान उनका नाम चे ग्वेरा हो गया। चे स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है- दोस्त। यही नाम बाद में उनकी पहचान बना और यह सत्य है कि चे-ग्वेरा विश्व के सर्वहारा के दोस्त बन गए। उन्होंने कहा- “अगर आप हर अन्याय पर रोष से कांप उठते हो तो आप मेरे कॉमरेड हो।” टाइम मैगजीन द्वारा चे ग्वेरा को बीसवीं सदी के सबसे प्रभावशाली 100 व्यक्तियों में शामिल किया गया है। फ्रांस के महान दार्शनिक और अस्तित्ववाद के दर्शन के प्रणेता ज्यां-पॉल सार्त्र ने ‘चे’ गेवारा को ‘अपने समय का सबसे पूर्ण पुरुष’ जैसी उपाधि दी थी।

23 वर्ष की उम्र में मेडिकल की पढ़ाई के दौरान चे-ग्वेरा ने लैटिन अमेरिका समेत 10000 किलोमीटर की यात्रा की। यह यात्रा उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण निर्णायक पड़ाव साबित हुई। इस यात्रा के दौरान चे ग्वेरा ने दक्षिण अमेरिका के लोगों के जीवन की विषम परिस्थितियों को देखा, उन्होंने भयंकर गरीबी को देखा, उन्होंने समझा किस तरह पूंजीवादी व्यवस्था ने लोगों से उनके अस्तित्व को छीन लिया है, कुष्ठ रोग से मर रहे मरीजों के साथ कैसा अनुचित व्यवहार किया जाता है,किस तरह खान में काम करने वाले मजदूरों का शोषण किया जाता है और समाजवादी कार्यकर्ताओं पर किस तरह अत्याचार किया जाता है। यह सब देखने के बाद चे इन परिस्थितियों को लेकर काफी चिंतनशील हो चुके थे। चे के अनुसार इन स्तथियो का मुख्य कारण थे- एकाधिकार पूंजीवाद, नव उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद, जिनसे छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका था-विश्व क्रांति।

इस तरह उनका वैचारिक रुझान साम्यवादी विचारों की तरफ बढ़ने लगा। डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी पूरी कर लेने के बाद चे डॉक्टर अर्नेस्टो ग्वेरा बन गये। उन्होंने एक पेशेवर डॉक्टर बनने का इरादा छोड़ दिया और एक बड़े सपने को पूरा करने की राह पर अग्रसर हो गए। इस दौरान ग्वाटेमाला में समाजवादी नीतियों की ओर उन्मुख गुज़मान सरकार थी। जिसने ग्वाटेमाला में कई बड़े भूमि सुधार प्रस्तावित किए इन भूमि सुधारों के पूर्ण होने पर अमेरिकी कंपनियों द्वारा ग्वाटेमाला में कब्जाई गयी लाखो एकड़ जमीन अमेरिका को अपने हाथों से जाती दिखने लगी। अमेरिका के साम्राज्यवादी आर्थिक हित प्रभावित हो रहे थे और अमेरिका ने ग्वाटेमाला की गुजमान सरकार का तख्तापलट कर कर दिया। इस सब को चे-ग्वेरा ने काफी करीब से देखा और समझा। चे समझ रहे थे किस तरह से अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियां अपने आर्थिक,सामरिक और राजनैतिक हितों के अनुकूल पूरी दुनिया पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रही थी।
अर्जेंटीना में चे ग्वेरा की फिदेल कास्त्रो और राउल कास्त्रो से से मुलाकात हुई। जिन्हें क्यूबा की अमेरिका समर्थित तानाशाह सरकार ने क्यूबा से निर्वासित कर दिया था। इन विद्रोहियों से मुलाकात के बाद चे ग्वेरा के लिए लिए आगे का रास्ता तैयार हो चुका था। चे ग्वेरा,फ़िदेल कास्त्रो ने अन्य परिवर्तनकारी व्यक्तियों के साथ मिलकर अमेरिका समर्थित तानाशाही सरकार के खिलाफ जंग छेड़ दी। क्यूबा में वही होता था जो अमेरिका चाहता था। अमेरिका ने क्यूबा की बातिस्ता सरकार की स्थिरता बनी रहने के लिये हर तरह से मदद की क्योंकि अमेरिका का काफी पैसा क्यूबा के तेल पर लगा हुआ था। क्यूबा की बातिस्ता सरकार और अमेरिकी सरकार अपने मंसूबों में कामयाब ना हो सकी। 1959 में 500 विद्रोहियों ने बातिस्ता सरकार का तख्ता पलट कर दिया। चे-ग्वेरा की सलाहानुसार फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में मार्क्सवादी व्यवस्था की स्थापना की।

चे ग्वेरा ने क्यूबा सरकार में उद्योग मंत्री रहते हुए भारत यात्रा की थी। बीबीसी की एक रिपोर्ट में इसका पुख्ता विवरण मिलता है। बीबीसी के मुताबिक़ चे ने भारत यात्रा के बाद 1959 में बाक़ायदा ‘भारत रिपोर्ट’ लिखी और उसे फिदेल कास्त्रो को सौंपा। इस रिपोर्ट में उन्होंने लिखा था,

‘काहिरा से हमने भारत के लिए सीधी उड़ान भरी। 39 करोड़ आबादी और 30 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल। हमारी इस यात्रा में सभी उच्च स्तरीय राजनीतिज्ञों से मुलाक़ातें शामिल थीं। नेहरू ने न सिर्फ़ दादा की आत्मीयता के साथ हमारा स्वागत किया बल्कि क्यूबा की जनता के समर्पण और उसके संघर्ष में भी अपनी पूरी रुचि दिखाई। हमें नेहरू ने बेशक़ीमती मशवरे दिए और हमारे उद्देश्य की पूर्ति में बिना शर्त अपनी चिंता का प्रदर्शन भी किया। भारत यात्रा में हमें कई लाभदायक बातें सीखने को मिलीं। सबसे महत्वपूर्ण बात हमने यह जाना कि एक देश का आर्थिक विकास उसके तकनीकी विकास पर निर्भर होता है और इसके लिए वैज्ञानिक शोध संस्थानों का निर्माण बहुत ज़रूरी है- मुख्य रूप से दवाइयों, रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान और कृषि के क्षेत्र में। जब हम भारत से लौट रहे थे तो स्कूली बच्चों ने हमें जिस नारे के साथ विदाई दी, उसका तर्जुमा कुछ इस तरह है- क्यूबा और भारत भाई-भाई। सचमुच, क्यूबा और भारत भाई-भाई हैं।’ 

मंत्री रहने के दौरान चे ग्वेरा ने कभी भी सत्ता को नहीं जिया। चे ग्वेरा की जीवनी के लेखक पत्रकार एंडरसन बताते हैं कि “उनका परिवार हमेशा सार्वजनिक बसों से यात्रा किया करता था और सप्ताह में एक दिन वह श्रमदान अवश्य किया करते थे।” यही एक मार्क्सवादी की पहचान है।
चे का मन यही रुकने वाला नहीं था चे-ग्वेरा ने तो विश्व क्रांति का सपना देखा था। क्यूबा क्रांति के बाद वे संपूर्ण दक्षिणी अमेरिका के राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्य को बदलने का संकल्प ले चुके थे। वे क्यूबा से से कांगो गए, वहाँ उन्होंने परिवर्तनकरियों को गुरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण दिया और व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष किया परंतु कांगो में वे असफल रहे। इसके बाद वे वोलिबिया आए और वोलीबिया में सरकार का तख्तापलट करने के संघर्ष में बोलिवियाई सरकार और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के द्वारा मार दिये गये। इस तरह चे ग्वेरा की मौत के बाद साम्राज्यवादी अमेरिका ने चैन की सांस ली। चे-ग्वेरा ने क्रान्ति के लिये हिंसक रास्ते को चुना, इस बात को लेकर उनकी आलोचना भी होती रही हैं।
चे ग्वेरा सत्ता विरोधी संघर्ष के प्रतीक और असाधारण व्यक्तित्व के रूप में सम्पूर्ण विश्व-समुदाय के बीच याद किए जाते हैं।

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