प्रज्ञा श्रीवास्तव और मोनिका मरांडी

एक स्क्रिप्ट देती हूँ। 2 लड़कियां हैं। देश के सर्वोच्च संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई करती हैं। कॉलेज से प्लेसमेंट हो जाती है। अच्छे खासे चैनलों में, जिन नौकरियों के लिए अधिकतर लोग मरते हैं वैसी एकदम। फिर समझ आता है कि नहीं यार ये नहीं करना है। घूमना है। यही तो सपना था। सपने को हकीकत में बदलती हैं। नौकरी छोड़ देती हैं। तो बस फिर क्या उठाया झोला और निकल पड़ती हैं घूमने के लिए। कहानियां खोजती हैं। उन कहानियों को और उन लोगों को हम तक लेकर आती हैं जिनके बारे में हमें भनक तक नहीं है। दोनों ‘अकेले’ देश के 28 से ज्यादा राज्य घूम चुकी हैं। एकदम क्लासिक फ़िल्म स्टोरी टाइप ज़िन्दगी लग रही है ना? ड्रीमी-सा सबकुछ। हां तो ये क्लासिक फिल्मी टाइप स्टोरी है प्रज्ञा श्रीवास्तव और मोनिका मरांडी की।

प्रज्ञा श्रीवास्तव और मोनिका मरांडी

क्या करती हैं ये दोनों?

वेबसाइट का नाम है ‘चलत मुसाफिर’। नाम सुनते ही वो चलत मुसाफिर मोह लिया रे पिंजरे वाली मुनिया याद आ गया ना। बस ये पिंजरे वाली मुनिया नहीं हैं। खूब घूमती हैं, खूब लिखती हैं। कहानियां खोजती हैं। बड़े शहरों में नहीं जाती हैं। किसी छोटे से शहर के छोटे से कोने से खोजकर लाती हैं कहानियां। गली-गली, नुक्कड़-नुक्कड़ फिरती हैं। सिखाती हैं, सीखती हैं। अकेले निकल पड़ती हैं दोनों किसी ट्रैन में। किसी बस में। देश के कितने लोगों की ड्रीम लाइफ को अकेले जी रही हैं। कसम से। कहती हैं कि, ‘हिंदी में ट्रेवल पर कम लिखा गया है अंग्रेजी में तो पटा पड़ा है, सभी ट्रैवेलर्स को एक साथ लाना चाहती हैं। इंडिया को हिंदी में देखना चाहती हैं और दिखवाना भी चाहती हैं। क्योंकि देश को देखने का असली मज़ा अपनी भाषा में है ना।’

क्या मिलेगा ‘चलत मुसाफिर’ पर?

चलत मुसाफिर पर ताज महल और लाल किला जैसी सुप्रसिद्ध चीजों पर लिस्टिकल वाले आर्टिकल नहीं मिलेंगे। यहां मिलेगा किसी राज्य के किसी छोटे से आदिवादी इलाके में सदियों से चला आ रहा छाउ नृत्य, राजस्थान के किसी छोटे से गाँव में 110 सालों से चली आ रही कोई मूक रामलीला, उत्तराखंड के किसी सुदूर इलाके में रह रहे एक ऐसे डॉक्टर जिनकी पूरी ज़िन्दगी ही लोगों की फ्री में प्लास्टिक सर्ज़री करते गुजर गयी, शहरों की डीजे वाली होली न मिले लेकिन बरसाने की लठमार और वृंदावन की विधवा होली मिल ही जाएगी। स्टेचू ऑफ यूनिटी की वर्ल्ड क्लास हाइट पर कोई आर्टिकल मिलेगा इसकी गारंटी नहीं पर हां किसी राज्य में हनुमान और शिव की सबसे बड़ी मूर्तियों के बारे में जरूर मिल जाएगा। दिल्ली का इंडिया गेट नहीं मिलेगा पर पुरानी दिल्ली की संकरी गलियों में बसी-छिपी कहानियां मिल जाएंगी आपको। कश्मीर का कोई घर जहां सब अपना सा है। बस्तर की दबी-छिपी कहानियां। आदिवासी औरतें और नक्सली इलाकों में पल रहे बच्चों की मासूम मुस्कान की कहानियां। बुंदेलखंड, छत्तीसगढ़ की कोई प्रथा, लहलहाती हुई फसलें, बहती हुई नदी, उड़ती हुई चिड़ियाँ। ये सब मिलेगा चलत मुसाफिर पर। सबकुछ रॉ। जैसे आप और हम उस जगह को देखना चाहते हैं बिना किसी एडिटिंग के, एकदम नेचुरल।

कैसे अलग है चलत मुसाफिर दूसरी ट्रेवल वेबसाइट से?

जैसे ‘ट्रेवलर’ और ‘टूरिस्ट’ एक जैसे शब्द लगते जरूर हैं पर होते नहीं हैं। ठीक वैसे ही। वो लाइन सुनी है कि, “जब हम किसी जगह पर ‘घूमने’ जाते हैं तब हम टूरिस्ट कहलाते हैं। लेकिन जब हम किसी जगह को जानने, महसूस करने और समझने जाते हैं तब हम ट्रेवलर कहलाते हैं।” बस एकदम यही फर्क है दूसरी ट्रेवल वेबसाइट में और ‘चलत मुसाफिर’ में। ये आपको घुमाती जरूर है लेकिन जानने के लिए, समझाने के लिए उस जगह के नुक्कड़-नुक्कड़, गली-गली से आपको मिलवाती है। घुमक्कड़ी से ही पत्रकारिता करती हैं। और सबसे अच्छी बात की देशभर के घुमक्कड़ यहां लिखते हैं। तो आपको कहीं और जाने की जरूरत भी नहीं होगी। आप एक ही जगह ढेर से घुमक्कडों से मिल सकते हैं। उनकी नज़र से हर जगह को देख सकते हैं। घर बैठे-बैठे।

मुसाफिरों का पता:

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