तत्कालीन मालवा राज्य की महारानी अहिल्यादेवी होलकर की आज जयंती है। वह देशवासियों के बीच नहीं हैं। प्रजा के हित में काम करने वाली आदर्श शासक अहिल्यादेवी होलकर 13 अगस्त, 1795 को स्वास्थ्य बिगड़ने की वजह से संसार छोड़कर चली गईं। किन्तु उनकी दयालुता,शासन शैली,न्याय व्यवस्था व अपनी परंपराओं को संजोए रखने के प्रति ललक से हमेशा सीख मिलती रहेगी। जिस दौर में महिलाओं के प्रति हेय धारणा थी, उस समय अहिल्याबाई के हाथों मालवा राज्य संभालने की जिम्मेदारी सौंपी गई। धार्मिक कार्यों से उन्होंने स्वयं को एक सनातनी हिन्दुत्वनिष्ठ नारी रूप में स्थापित किया। दुनिया को आईना दिखाया कि शस्त्रों के बल पर ही नहीं,बल्कि प्रेम व धर्म के मार्ग पर भी चलकर राज किया जा सकता है।

सनातन धर्म में एक से बढ़कर से एक वीरांगनाओं ने जन्म लिया। महारानी अहिल्याबाई भी उनमें से एक हैं। उन्होंने अपने कार्यों व सिद्धांतों से सनातन संस्कृति व भारतीय परंपरा का परचम लहराया। गौरवपूर्ण वैभवशाली इतिहास संजोने का काम किया। उन्होंने सनातन परंपरा को समृद्ध किया। आज की युवा पीढ़ी को अहिल्याबाई के पराक्रम से सीखने की आवश्यकता है। कई युद्धों में एक साहसी योद्धा की भांति उन्होंने सूझ-बूझ के साथ नेतृत्व किया और विजय हासिल की। उनके उत्कृष्ट विचारों, न्यायव्यवस्था एवं नैतिक आचरण के बल पर ही समाज ने उन्हें देवी का स्थान दिया। नागरिक ससम्मान उन्हें राजमाता अहिल्यादेवी होलकर पुकारते थे।

होलकर वंश की पूर्वपीठिका

पूणे में जेजुरी क्षेत्र के निकट होल नाम का एक छोटा ग्राम है। कोंडाजी वहाँ के एक मान्यवर किसान थे। होल ग्राम के निवासी होने से वे होलकर नाम से जाने जाने लगे। उनका एक पुत्र था-मल्हारराव होलकर।

कोंडाजी की असमय मृत्यु के कारण वह अपने मामा नारायण बारगलजी के घर में ही पलकर बड़ा हुआ। घोड़ा, घुड़सवारी एवं युद्धविद्या का प्रशिक्षण प्राप्त करके मल्हारराव ने अपनी वीरोचित योग्यता प्रकट की। मामा ने अपनी कन्या गौतमाबाई का विवाह मल्हारराव से कर दिया।

मालवा की लड़ाई में उत्कृष्ट काम करने के कारण मालवा का 1/3 हिस्सा तथा इन्दौर की देखरेख करने का दायित्व मराठाओं ने मल्हारराव को सौंपा। 1728 में मल्हारराव को उत्तर पार के 12 परगने, और 1731 में और 70 परगने प्राप्त हुए।
मालवा प्रदेश की व्यवस्था मल्हारराव को दी गयी। वह सम्मानपूर्वक ‘सूबेदार’ पुकारे जाते थे। ऐसा सम्मान प्राप्त करने वाले मल्हारराव होलकर एकमेव मराठा सरदार थे।मल्हारराव होलकर ने अपने पुत्र खण्डेराव होलकर का विवाह अहिल्याबाई से कराई। बाद में अहिल्याबाई मालवा साम्राज्य की महारानी बनीं।

व्यक्तिगत जीवन

अहिल्याबाई का जन्म 31 मई, 1725 को मह के वर्तमान अहमदनगर जिले के जामखेड़ तहसील के चौंडी ग्राम में मणकोजी शिंदे के घर में हुआ।
एकबार पेशवा महाराजा मालवा से पूणे जा रहे थे, उस दौरान चौंडी ग्राम में उनका पड़ाव हुआ। प्रात:काल टहलते समय शिव मन्दिर में पूजा में लीन एक बालिका उन्होंने देखी।

उन्होंने मल्हारराव से कहा कि “आपके पुत्र खंडेराव के लिए वह बालिका सुयोग्य है, आप उसे अपनी पुत्रवधू बनाओगे तो कुल का नाम उज्ज्वल करेगी।” बालिका को देखकर मल्हारराव भी प्रसन्न हुए थे।

पेशवा महाराज ने मणकोजी शिंदे को बुलाकर यह प्रस्ताव रखा। ऐसा सौभाग्य वह ठुकरा नहीं सकते थे, अत: उन्होंने प्रस्ताव सहर्ष स्वीकार कर ली। 20 मई, 1737 को खंडेराव होलकर के साथ अहिल्याबाई का विवाह सम्पन्न हुआ। धीरे-धीरे वह अपने राज्य प्रशासन की बारीकियों के अध्ययन में रूचि लेने लगीं और हाथ बंटाने लगीं।

मल्हारराव लड़ाईयों में जाते समय अहिल्या पर राज्य की जिम्मेदारी सौंपकर जाते। अधिकारियों को उचित सूचना देते थे कि “राज्य की आय सूबेदार के पराक्रम एवं प्रारब्ध पर निर्भर है, लेकिन उसकी व्यवस्था देखना, लाभ-हानि का विचार करना आदि अहिल्याबाई के आदेश से ही होगा।”

24 मार्च, 1754 को कुंभेरी की लड़ाई में युद्ध के दौरान पति को वीरगति प्राप्त होने के बाद उन्होंने सती होने का निश्चय किया। किंतु उनके ससुर मल्हारराव ने मना कर दिया और साम्राज्य संभालने के लिए अहिल्याबाई को मनाया।

उन्होंने समझाया कि प्रशासक के अभाव में राज्य लावारिस हो जाएगा। साम्राज्य असुरक्षित हो जाएगा। राज्यकर्ताओं को अपने व्यक्तिगत रिश्ते, सुख-दुःख नहीं होते। “जो मर गया वह बहू थी, जीवित है वह पुत्र खंडेराव है। अहिल्या! मुझे आश्वासन चाहिए, तुम सती नहीं होगी। अगर लोकापवाद का डर है तो मैं तुम्हारे पीछे पहाड़ की तरह खड़ा हूं। रुढ़ियों में फंसकर अपना कर्तव्य मत भूलो।” उन्होंने अपने ससुर मल्हारराव की बात स्वीकार की और 11 दिसम्बर, 1767 को मालवा की महारानी बनीं।

अहिल्याबाई की सास गौतमाबाई के पास महेश्वर, चौली, इन्दौर हरसोल, बारलाई आदि से 263000 रुपये और चांदवड कारेगाव, अंबाड आदि से 36000 रुपये 10 आने की सम्पत्ति थी, जो उनकी मृत्यु के पश्चात अहिल्याबाई को प्राप्त हुई। उसमें उन्होंने और 18 गांव जोड़े।

उनके कुशल नेतृत्व व प्रशासन के कारण प्रजा ने उन्हें देवी की उपाधि दी। जिसके बाद उन्हें अहिल्यादेवी होलकर पुकारा जाने लगा। वह सनातनी हिन्दुत्वनिष्ठ महारानी के रूप में विख्यात हुईं। उन्होंने अपने शासनकाल में अनेक धार्मिक कार्यों को पूरा किया।

अग्निपरीक्षा के क्षण

1761 के पानीपत के तीसरे युद्ध के समय मल्हारराव ने सलाह दी थी कि अहमदशाह अद्वाली से खुले मैदान में लड़ने के बजाय छापामार नीति अपनाना उचित रहेगा, लेकिन बात अनसुनी रह गयी। जिसके कारण हिन्दू सरदारों का पराभव हो गया।
खोयी प्रतिष्ठा पुनः प्रस्थापित करने के लिए अहिल्याबाई गोहाड का किला जीतकर युद्ध क्षेत्र में अपनी प्रथम जीत शान से लिखीं। उनकी धार्मिकता के बाद लोगों ने उनकी वीरता भी देखी।

1761 में उनकी सास गौतमाबाई का स्वर्गवास हुआ। तीन साल के अन्दर ही 1764 में मल्हारराव की मृत्यु हुई। हिन्दू साम्राज्य के प्रमुख आधार स्तम्भ के रूप में मल्हारराव की ख्याति थी।

मल्हारराव का अन्तिम संस्कार आलमपुर में सम्पन्न कर अहिल्याबाई ने उनकी स्मृति में भव्य छत्री बनवाई। अब उनके नेतृत्व में पुत्र मालेराव शासन चलाने लगा। अपने दादा जैसा दूरदर्शी, राजनीति कुशल नहीं था। वह भी कुछ वर्ष के बाद स्वर्ग सिधार गया।

पुत्र की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद अहिल्याबाई मालवा की शासन-व्यवस्था अपने हाथ में लेने के लिए पेशवा के समक्ष याचिका दायर कर दीं। हालांकि कई पेशवाओं ने विरोध दर्ज भी कराया, लेकिन अंततः 11 दिसम्बर, 1767 को वह स्वयं इंदौर की शासक बन गयीं। उन्होंने अपने विश्वसनीय सेनानी सूबेदार तुकोजीराव होलकर (मल्हार राव के दत्तक पुत्र) को सेना प्रमुख बनाया।

वह 13 अगस्त, 1795 श्रावण कृष्ण चतुर्दशी को ”गंगा जल सम निर्मल जीवन शिवनाम” का स्मरण करते हुए शिवप्रवाह में विलीन हो गईं। महेश्वर में नर्मदा के पवित्र किनारे पर उनका पार्थिव शरीर अग्नि-समर्पण किया गया।

श्रेष्ठ प्रशासक

होलकर राज्य का पुराना अधिकारी गंगाधर चन्द्रचूड राघोबा दादा पेशवे के साथ मिलकर राज्य पर कब्जा करना चाहा। सेना लेकर क्षिप्रा नदी के तट पर आ गया।

अहिल्याबाई ने पत्र भेजकर कहा कि “आपकी इच्छा कभी पूरी नहीं होगी। मुझे अबला न समझें। मैं कौन हूं, इसका परिचय युद्धभूमि में ही होगा। मेरी महिला सेना पर आपने विजय पाई तो भी आपको कोई बड़प्पन नहीं मिलेगा। परन्तु उल्टा हुआ तो आपकी ही हंसी उड़ाई जायेगी। इसका विचार करके ही आप युद्ध के लिए आगे बढ़ें।”

विपरित परिस्थिति भांपते हुए राघोबा युद्ध की बात से किनारा कर लिया और संदेश भिजवाया कि उनके इकलौते पुत्र की मृत्यु पर शोक प्रकट करने आया है, युद्ध करने नहीं।

जिसका जवाब देते हुए अहिल्याबाई ने कहा कि “आप शोक प्रकट करने आये हैं तो इतनी बड़ी सेना का क्या काम? आप अकेले ही पालकी में बैठकर पधारें। घर आपका है, चाहे जितने दिन रहिए। आपका स्वागत है।” राघोबा बाजी हार गये। पालकी में बैठकर वे इन्दौर आये।

जरूरत से ज्यादा करों का बोझ प्रजा पर डालना उन्हें बिल्कुल पसन्द नहीं था। पहले दिये गये धन का पूरा हिसाब प्राप्त होने के उपरान्त ही अगली किश्त देने की उनकी नीति थी।

रामाराव आप्पाजी नाम का एक सेवक एक बार मुहिम में जा रहा था। रास्ते में वर्षा के कारण उसके पास के कागज पत्र गीले हो गये। पहले तो अहिल्याबाई ने उसकी अव्यवस्था के लिए उसको डाँटा, परन्तु साथ-साथ उसको जल संरक्षक साहित्य एवं गरम कपड़े भी दिये। किसी को नाराज न करते हुए अपनी कार्य करवा लेने की कुशलता उनमें थी।
अहिल्याबाई ने बार-बार अपने अधिकारी नहीं बदले, परन्तु किसी का एकाधिकार न हो इसके बारे में भी वह हमेशा सतर्क रहती थीं।

दोपहर से संध्या तक वं भोजनोपरान्त रात ग्यारह बजे तक वह दरवार में रहती थीं। अतएव उन्हें ‘लोकमाता’ की उपाधि मिली थी। अहिल्याबाई ने अभयारण्य भी निर्माण कराया।

‘किसान सुखी तो देश सुखी’ यह धारणा होने के कारण उन पर बोझिल कर नहीं लगाये थे। वर्षा की कमी या अकाल होने पर वह भी माफ किया जाता था या सेनाओं के आने-जाने से फसल खराब होने पर सम्बन्धित किसानों को क्षतिपूर्ति दी जाती थी।
अहिल्याबाई ने बार-बार युद्ध नहीं किया। चन्द्रावत द्वारा होलकर शासन से विद्रोह के कारण उसके व अहिल्याबाई के बीच युद्ध हुआ। इसमें अहिल्याबाई विजयी हुई थीं।

अंग्रेजों ने बसई का किला जीतने का पूरा प्रयत्न किया। लेकिन अहिल्याबाई ने महादजी शिंदे को दक्षिण में अंग्रेजों से टक्कर देने के ​लिए लगाया और वह स्वयं उत्तर में तैनात हो गईं। अंग्रेजों की तुलना उन्होंने रीछ से की है।

न्याय व्यवस्था

देवी अहिल्याबाई न्याय के प्रति बहुत सजग रहती थीं। उन्होंने अपने राज्य में नियमबद्ध न्यायालय बनवाये थे। गाँवों में पंचायत को न्यायदान के व्यापक अधिकार दिये थे।

इनके न्याय से सहमत न होने वाले नागरिक बेरोक-टोक देवी अहिल्याबाई के सामने जा सकते थे। उनकी न्याय पद्धति पर नागरिकों की इतनी श्रद्धा थी कि उनकी आज्ञा न मानना वे पाप समझते थे।

अहिल्या महिला सशक्तिकरण की पक्षधर थीं। विधवा महिलाओं को उनका हक दिलवाने के लिए कानून में बदलाव किया। विधवा महिलाओं को उनके पति की संपत्ति को हासिल करने का अधिकार दिलावाया।

उनको पुत्र गोद लेने का हकदार बनाया। इससे पहले विधवाओं के पति की संपत्तियां राजकोष में जमा करा ली जाती थीं और पुत्र गोंद लेने का विधान नहीं था।

निर्माण कार्य

उनके शासन में इंदौर एक छोटे से गांव के स्थान पर फलते-फूलते शहर में स्थापित हो गया। मालवा में किले, सड़कें बनवाने का श्रेय अहिल्याबाई को ही जाता है।

18वीं सदी में राजधानी माहेश्वर में नर्मदा नदी के किनारे एक भव्य, शानदार एवं आलीशान अहिल्या महल बनवाया। द्वारिका, रामेश्वर, बद्रीनारायण, सोमनाथ, अयोध्या, जगन्नाथ पुरी, काशी, गया, मथुरा, हरिद्वार, आदि स्थानों पर कई प्रसिद्ध एवं बड़े मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया और धर्मशालाओं का निर्माण करवाया।

कलकत्ता से काशी तक सड़क निर्माण करवाया। इसके अलावा उन्होनें गया में विष्णु मन्दिर व काशी (वाराणसी) में अन्नपूर्णा मन्दिर बनवाए।

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दुनिया भर में प्रसिद्ध वाराणसी स्थित सोना से जड़ा काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। वहीं, अपने शासनकाल में सिक्कों पर ‘शिवलिंग और नंदी’ अंकित करवाईं। वह परम शिवभक्त थीं।

शिव की भक्ति में लीन अहिल्या

अहिल्याबाई राजाज्ञाओं पर हस्ताक्षर करते समय अपना नाम कभी नहीं लिखती थी। अपने नाम के स्थान पर श्रीशंकर लिख देती थीं।

उनके बाद तब से लेकर स्वराज्य की प्राप्ति तक इंदौर में जितने भी राजाओं ने वहां की बागडोर संभाली, सभी राजाज्ञाएं श्रीशंकर के नाम पर जारी होती रहीं।

महारानी अहिल्या की ऐतिहासिक शासनकाल के आधार पर ही उनके सम्मान में भारत सरकार ने 25 अगस्त, 1996 को उनके नाम पर एक डाक टिकट जारी किया। आज देश में अहिल्यादेवी के नाम पर विश्वविद्यालय, एयरपोर्ट और कई संस्थान हैं।

लुटेरे भील बने शूर सैनिक

सामंतों की साजिश में आकर उपद्रव करने वाले भीलों के बारें में महारानी अहिल्याबाई ने सूना तो उनके सरदार को दरबार में बुलवाया। जंगल मांर्ग से जाने वाले यात्रियों को भील लूट लेते थे।

महारानी ने उन्हें राज्य की सेना में नौकरी देने का प्रस्ताव रखा। भील के सरदार ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार किया और राज्य की सुरक्षा में जुट गये।
अहिल्याबाई ने उनके परिवारों के लिए जमीन तथा काम-धंधे की सुविधाएं उपलब्ध करा दीं। भीलों पर ही यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गयी। निर्धारित क्षेत्र में लूटमार की घटना होने पर क्षतिपूर्ति का कानून भी बनाया गया।

यात्रियों से जंगल से गुजरते समय एक कौड़ी कर के रूप में लेने की व्यवस्था शुरु की गयी, जो ‘भीलकौड़ी’ नाम से प्रसिद्ध है।

डाक व्यवस्था

1783 में देवी अहिल्याबाई ने डाक व्यवस्था की शुरूआत की। महेश्वर से पुणे तक डाक व्यवस्था चलाने का दायित्व पदमसी नेन्सी नामक कम्पनी को सौंपा गया था। डाक लाने व ले जाने के लिए 20 जोड़ियां थीं। प्रत्येक जोड़ी को 204 रुपये वार्षिक वेतन दिया जाता था।

पुणे से दिल्ली 16 दिनों में, कलकत्ता से दिल्ली तक वर्षाकाल में भी 15 दिनों में डाक पहुंचाई जाती थी। जंगल से गुजरते समय गांव कामगार मदद करते थे। डाकवालों को नदी पार करते समय प्राथमिकता दी जाती थी।

डाक ले जाते समय बाधा डालना गम्भीर राजकीय अपराध माना जाता था। डाक पहुंचने में विलम्ब होने पर प्रतिदिन उत्तरोत्तर देय राशि में कटौती होती थी। कुछ हानि होने पर कम्पनी से क्षतिपूर्ति ली जाती थी।

पर्यटन विभाग

देशभर में विभिन्न स्थानों पर उन्होंने धर्मशालाएं, अन्नक्षेत्र, प्याऊ, कुएं, नदियों पर घाट जैसी अनेक सुविधाएं उपलब्ध करा दीं। इससे यात्रियों की यात्रा सुलभ हुई। व्यापारी लोगों का आवागमन बढ़ने के कारण व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

अपमान चिह्न मिटाया

विदेशी आक्रांताओं ने भारत के तीर्थस्यलों को नष्ट किया। मुगलों ने मंदिरों को तोड़ रखा था। तीर्थयात्रा के दौरान उनसे यह सब देखा नहीं गया और इनके जीर्णोंद्धार में वह जुट गईं।

पर्यटन विभाग के विकास तथा भग्न मन्दिरों के पुनर्निर्माण कार्य के लिए सम्पूर्ण व्यय अहिल्याबाई ने अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति से ही किया। मन्दिरों में फिर से पूजन, धार्मिक ग्रन्थों का पठन हो, प्रार्थना हो, इसको लेकर उन्होंने विचारपूर्वक योजना बनायीं।

बद्रीनारायण से लेकर रामेश्वर तक, द्वारका से लेकर भुवनेश्वर तक अनेक मन्दिरों का पुनर्निर्माण अहिल्याबाई ने किया। उन्होंने अन्य राज्यों में भी काम किया। उनके सत्वशील चारित्र्य के कारण किसी भी राज्य में उनको विरोध नहीं हुआ।

सर्वधर्म समभाव से प्रेरित अहिल्याबाई ने अनेक मस्जिदों को भी स्थायी दान दिया। मन्दिरों में अखण्ड-दीप जलते रहे, इसके लिए अनुदान स्वरूप पर्याप्त तेल दिया। धर्मस्थल शासनालम्बी न होकर स्वावलम्बी हों, इसके लिए उन्होंने भूखण्ड दान दिये।

विद्या केन्द्र महेश्वर

देवी अहिल्याबाई ने अनेक विद्वान अभ्यासकों को राजाश्रय दिया। कुछ विद्वानों को उन्होंने सम्मानपूर्वक महेश्वर में आमन्त्रित किया। उनमें शास्त्र, व्याकरण, पुराण, कीर्तन, वेदान्त, ज्योतिष, संस्कृत, वैद्यक, पुजारी आदि विषयों के लगभग 20 विद्वानों का उल्लेख मिलता है। उन्होंने गंगाजल की कावड़ निर्धारित स्थान पर निर्धारित समय पर पहुंचाने की व्यवस्था स्थायी रूप से की। ऐसे 32 स्थानों के नाम उपलब्ध हैं।

वाचनालय

अहिल्याबाई के काल में मुद्रण कला नहीं होने के कारण हस्तलिखित ग्रन्थ मूल्यवान एवं दुर्लभ थे। सामान्यत: शास्त्री, पंडित, पौराणिक, वैदिक, जोशी, प्रतिष्ठित गृहस्थ, सरदार, जागीरदार, राजा महाराजा आदि लोगों के पास हस्तलिखित ग्रन्थ उपलब्ध होते थे। ऐसे ग्रंथों का दरबार में नकलची रखकर उन्होंने संग्रह कराया। होलकर साम्राज्य के इतिहास में ऐसे 88 ग्रन्थों की सूची मिलती है।

देवी अहिल्याबाई के राज्य में सामान्य कलाकारों का भी ध्यान रखकर सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं। बुनकर उद्योग को प्रोत्साहन स्वरूप अन्न, वस्त्र, निवास, उद्योग के लिए धन एवं तैयार कपड़ा बेचने की भी व्यवस्था थी।

प्रसंग

दिल्ली बादशाह का पत्र लेकर एक सेवक आया। उसने कहा कि पत्र बादशाह का है और स्वागत के लिये दो कदम आगे बढ़कर पत्र लेना चाहिये। तब अहिल्याबाई ने निर्भयता से कहा कि “श्रीमंत पेशवा ने बादशाह को जागीर दी है, इस कारण उसके पत्र का इतना सम्मान करने की कोई आवश्यकता नहीं है।”

(सेंटर फॉर सोशल स्टडीज, भोपाल द्वारा यह लेख जारी है।)

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