कर्मवीर के साथ बच्चे

कोरोना काल में हमारे समाज के गरीब और वंचित तबकों पर दिक्कतों का पहाड़ टूट पड़ा. राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन लगने के बाद मजदूरों के सामने कोरोना संकट से बड़ी चिंता भूख की सताने लगी. इस कारण उन्हें शहरों से अपने गांव के तरफ पैदल ही पलायन को मजबूर होना पड़ा. पलायन के सफर में मजदूरों को तपती धूप, भूख-प्यास समेत सड़क दुर्घटना में मौत को गले लगा लेने तक की पीड़ा का सामना करना पड़ा. पलायन का यह सफर मजदूरों के लिए यातनाओं से भरा पड़ा था.

उनकी परेशानियों को कम करने की कोशिश में कई सामाजिक संगठन आगे आएं. कई ऐसे समाजसेवी भी थे, जो शहर से गांव के लिए वापस लौट रहे प्रवासी मजदूरों की मदद के लिए आगे आएं. उन्हीं सामाजसेवीयों में से एक थे ‘कर्मवीर’. कर्मवीर ने अपने नाम को अपने व्यवहार में आत्मसात करके कोरोना काल में भी जरुरतमंदों की मदद के लिए डटे रहे. कोरोना दौर में कर्मवीर ने पैदल रहे मजदूरों के पांव में चपल दिया और जो मजदूर पैदल चलने के दौरान काफी जख्मी हो गए थे, उनके जख्म पर मलहम-पट्टी भी किया.

कर्मवीर एक महिला को चपल पहनाते हुए
एक बुजुर्ग शख्स के पैर पर आई चोट के बाद मलहम-पट्टी करते हुए कर्मवीर

इसके अलावा, उन्होंने खाना बांटा और मास्क देकर मजदूरों को कोरोना से बचने के लिए सलाह दिया. कर्मवीर इतने तक ही नहीं रुके उन्होंने कोरोना काल के दौरान गरीब बच्चों को पढ़ाना जारी रखा. कोरोना दौर में गरीबों और वंचित समुदाय के लोगों के झुग्गी-झोपड़ीयों में जाकर राशन-पानी देते हैं.

कर्मवीर कहते है,”इस महामारी ने गरीबों को आर्थिक रुप से परेशान कर दिया है. ऐसे में हम जैसे लोगों की जिम्मेदारी और कर्तव्य बनता है कि हम गरीबों की हर संभवतः मदद करें.”

कर्मवीर गरीबों को राशन बाटते हुए

कर्मवीर ने खुद को समाजसेवा के कार्यों में समर्पित कर दिया है. दिल्ली स्थित एक बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी में कर्मवीर काम करते हैं. वो पेशे से अकाउंटेंट है और पैशन से सामाजसेवी है. उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य कॉर्पोट कंपनी के नीचे झुग्गी-झोपड़ीयों में रहने वाले लोगों की भलाई के लिए समर्पित कर दिया है.

कर्मवीर को सामाजसेवी कार्यों से इतना प्रेम है कि उन्होंने अपनी एक टीम बनाई है, नाम है ‘कर्मवीर सेवा ट्रस्ट’. जब हमने पूछा कि कोरोना काल के दौरान लोगों की मदद करने में अगर आप संक्रमित हो जाते तो? क्या इसका डर आपको नहीं लगता? जवाब में उन्होंने कहा, “मैं लोगों की मदद सावधानी के साथ करता हूं. सामाजिक दूरी और मास्क लगाता हूं. जिनकी मदद करता हूं, उनको भी मास्क देता हूं और उनसे निवेदन करता हूं कि कोरोना से संबंधित नियमों का पालन करें.”

कर्मवीर का समाज के प्रति लगन और काम देखकर यूनाईटेड नेंशन (UN) ने इन्हें सम्मानित किया है। कर्मवीर को यूनाईटेड नेंशन (UN) ने ‘कर्मवीर चक्र’ से सम्मानित किया है. कर्मवीर ने बताया, “जब सामाज सेवा काम के लिए मुझे सम्मानित किया था तब मुझे ये काम जारी रखने की एक नई प्ररेणा मिल गई. सम्मान प्राप्त करते हुए कुछ तस्वीरें मैंने सोशल मीडिया पर डाला. फिर मुझे मेरे कंपनी वालों ने समाजसेवा करने के पीछे मेरे प्लानिंग के बारे में पूछा. मैंने उनको अपनी प्लानिंग के बारे में समझाया. फिर मुझे कंपनी की कैंटिन से बचा हुआ खाना मिलने लगा. इससे पहले मैं 50-60 बच्चों को खाना देता था, अब 200 से ज्यादा बच्चों को खाना दे पा रहा हूं.”

UN के मंच पर कर्मवीर सम्मान प्राप्त करते हुए। इस सम्मान का नाम ‘कर्मवीर चक्र’ है।

शिक्षा को लेकर कर्मवीर काफी गंभीर है. उनका कहना है, “मैं गरीब बच्चों को बुनियादी रूप से इतना योग्य बना देना चाहता हूं कि बच्चे अच्छी शिक्षा हासिल कर सकें। दिल्ली के सरकरी स्कूल में दाखिला करवाने की कोशिश रहती हैं.” कर्मवीर का मानना है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई होती हैं. इसलिए वो बच्चों को बुनियादी शिक्षा देने में मदद करते हैं.

बच्चों को पढ़ाते हुए कर्मवीर

शिक्षा के मसले पर बातचीत में आगे बताते हैं, “इन बच्चों के माता-पिता इतने गरीब होते हैं कि बच्चों को स्कूल तक नहीं भेज पाते हैं. ऐसे में मैंने एक तरकीब निकाली. मैंने बच्चों के माता-पिता को स्वावलम्बन(आत्मनिर्भर) बनाने की दिशा में काम किया. इसके लिए मैंने एक प्रोजेक्ट शुरु किया. आचार,पापड़ और मुरबे का. इसके लिए हमने उनको मैटेरियल दिया. बन जाने के बाद, फिर उसे हम लोगों ने बाजार में बेचा. ये करने के पीछे का मेरा उद्देश्य था कि उनके घर का खर्चा चल सकें. इस पहल से हमें अच्छे परिणाम मिले रहे हैं.”

महिलाएं मुरब्बा बनाते हुए

कर्मवीर उन बच्चों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देते है, जो कमजोर हैं। ऐसे बच्चों के लिए खाने की विशेष व्यवस्था करते हैं। कर्मवीर का कहना है, “हम बच्चों को सिर्फ खाना ही नहीं देते हैं, बल्कि उन्हें दूध और केला भी देते हैं, ताकि बच्चें स्वस्थ्य रहे.” कर्मवीर ने बच्चों को केला और दूध देने की वजह बताई, “जब मैं बच्चों को पढ़ाता था, तब मैंने देखा कि कई बच्चे कुपोषण का शिकार थे, उन्हें कुपोषण से मुक्त करने के लिए दूध और केला देना शुरु किया और आज मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि सभी बच्चे कुपोषण मुक्त हो गए. मेरी टीम ने कुपोषण पर जीत हासिल करके उन्हें सुपोषण बना दिया हैं.”

बच्चों को भोजन वितरण करते हुए

कोरोना के कारण लागू लॉकडाउन से उपजी परेशानी के बारे में कर्मवीर बताते है, “ज्यादातर सामाजिक संगठनों ने मानसिक और दिव्यांग रोगियों के देखभाल का खासा ध्यान नहीं दिया. वैसे भी उन लोगों की निर्भरता सड़क पर चलते-फिरते लोगों पर होती हैं. लेकिन, लॉकडाउन के कारण लोग सड़कों पर नहीं थे. ऐसे में उनकी स्थिति काफी बिगड़ने लगी थी. चूंकि, उनकी स्थिति मुझे अच्छे तरह से पता है क्योंकि मैं लॉकडाउन से पहले भी इन लोगों की सेवा करता था. अब भी कर रहा हूं. लेकिन, मलाल इस बात है कि उन्हें प्रशासन के तरफ से खास तौर पर ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं.”

दिव्यांग की मदद करते हुए

जब मैंने पूछा, इतना सब कुछ कर लेने की प्ररेणा,समर्पण और जोश का स्त्रोत? इसके जवाब में कर्मवीर कहते हैं, “बड़े-बड़े संगठनों के पास पीआर टीम होती हैं. मेरे पास एक प्यारी टीम है, यही मुझे प्ररेणा और साहस देती हैं.”

कर्मवीर और उनकी टीम

अगर आप कर्मवीर और उनकी टीम (सुरेन्द्र सिंह,प्रदीप माथुर,संदीप कुमार और अश्वनी मिश्रा) के साथ मिलकर उनके द्वारा किए जा रहे सामाजिक कार्यों से जुड़ना चाहते हैं तो आप नीचे दिए दिए नम्बर पर संपर्क करके उनसे सीधे जुड़ सकते हैं।

कर्मवीर का संपर्क सूत्र- 8368391136

TNN ऑनलाइन की पूरी टीम कर्मवीर और उनके टीम को भविष्य के लिए शुभकामनाएं देती हैं।

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