विश्व के इतिहास में रानी दुर्गावती की वीरता, साहस व शासन प्रणाली के किस्से स्वर्णिम अक्षरों में अंकित हैं। दुर्गावती भारतीय इतिहास की एक ऐसी वीरांगना थीं, जिन्होंने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया। अपने पति की मौत के बाद न केवल गोंडवाना राज्य की शासक बनी, बल्कि उन्होंने एक साहसी शासक की तरह अपने राज्य की रक्षा के लिए मुगलों से कई लड़ाइयां भी लड़ीं और युद्ध करते-करते अपना सर्वोच्च बलिदान देकर वीरगति को प्राप्त हुईं, उन्होंने कभी समझौता नहीं किया, देश और नारी शक्ति के सम्मान के लिये युद्ध लड़ा। भारत में अब तक के मुस्लिम सुल्तानों या बादशाहों से भारत के योद्धाओं ने जितने भी युद्ध किये थे, वे वास्तव में देश के सम्मान और नारीशक्ति के सम्मान के लिये ही लड़े गये थे। क्रूर अकबर जैसे मुगल आक्रांताओं का रानी ने बहादुरी से सामना किया था। उन्होंने अपने शासनकाल में कृषि, पर्यटन, निर्माण कार्य खूब किया था, जिसके कारण आम जनमानस में बहुत लोकप्रिय रहीं।

जन्म और प्रारम्भिक जीवन

रानी दुर्गावती का जन्म 05 अक्टूबर,1524 को कालिंजर दुर्ग (वर्तमान में जिला बांदा) में महाराजा कीर्ति सिंह चंदेल के यहां हुआ था। दुर्गाष्टमी के दिन जन्म होने के कारण उनका नाम दुर्गावती पड़ा। बाल्यावस्था से ही बुद्धिमान और साहसी दुर्गावती भाला, तलवार, धनुष-बाण चलाने व तैराकी में प्रवीण थीं। 1540 में दुर्गावती का विवाह गोंडवाना राज्य (गढ़ा मण्डला) के महाराजा संग्राम सिंह के पुत्र दलपत शाह से हुआ था। 1544 में रानी ने वीरनारायण नामक पुत्र जन्म दिया। 1548 में राजा दलपत शाह के मृत्यु के पश्चात वीरनारायण का राज्याभिषेक हुआ और रानी दुर्गावती ने राज्य की बागडोर संभाला, उस समय उनकी आयु केवल 25 वर्ष थी। गोंडवाना राज्य में 52 गढ़ थे।

घूंघट प्रथा का विरोध

मुगलों से प्रभावित रानी के देवर चन्द्र सिंह ने घूंघट रखने के लिये कहा तो उन्होंने स्पष्ट मना करते हुए कहा कि ‘गोंड कबसे पर्दा डालने लगे? यह प्रथा किसी के लिये ठीक नहीं है।’

कृषि व्यवस्था

सभी गढ़ों का प्रवास करते समय रानी दुर्गावती राज्य में अच्छी कृषि हेतु ताल व बाँध निर्माण की आवश्यकता समझीं। उन्होंने रानी ताल, चेरी ताल, आधार ताल सहित जबलपुर में 52 तालाबों का निर्माण करवाया था। तलाबों के अलावा उन्होंने अनेक मंदिर व धर्मशालाओं का भी निर्माण कराया। रानी ने किसानों के लिये गोदान, भूदान, धातुदान, पशुपालन आदि पर बल दिया। वह खेतों में जाकर किसानों से मिलती थीं और उत्सा,हवर्धन करती थीं।

सैन्य शक्ति

रानी की सेना में 20000 घुड़सवार तथा एक हजार हाथी दल के साथ-साथ बड़ी संख्या में पैदल सेना थी। सहायिका रामचेरी के नेतृत्व में नारी वाहिनी का भी गठन किया गया था अर्थात उनकी सेना में युवतियां भी तैनात थीं। गोंडवाना राज्य का क्षेत्रफल उत्तर में नरसिंहपुर, दक्षिण में बस्तर छत्तीसगढ़, पूर्व में संभलपुर (उड़िसा) एवं पश्चिम में वर्धा (महाराष्ट्र) तक फैला था। गोंडवाना राज्य को गढ़ा मण्डला भी कहा जाता था।

बाजबहादुर को हराया

रानी दुर्गावती के पति राजा दलपतशाह के निधन के पश्चात जिन शत्रुओं ने रानी के राज्य पर गिद्ध-दृष्टि डाली, उनमें मालवा का मंडलिक राजा बाजबहादुर भी सम्मिलित था। रानी ने बाजबहादुर के आक्रमण का बड़ी बहादुरी से सामना किया और निर्णायक रूप से पराजित किया। बाजबहादुर को रानी ने तीन बार पराजित किया था।

रानी के समक्ष अकबर का प्रस्ताव

बाजबहादुर के बाद अकबर की कु-दृष्टि रानी दुगार्वती पर पड़ी। एक महिला का शासक होने की बात उसे हजम नहीं हुई। वह रानी के राज्य पर आक्रमण की योजना में जुट गया। अकबर ने प्रस्ताव रखा कि यदि वह युद्ध से बचना चाहती हैं तो अपने सफेद हाथी (सरमन) और अपने विश्वासपात्र मंत्री आधारसिंह को यथाशीघ्र उसे सोंप दें। अकबर ने रानी के समक्ष ऐसी शर्त रखी थी, जिसे रानी मानती ही नहीं, ताकि उसको आक्रमण का बहाना मिल जाए।

अकबर के प्रस्ताव को ठुकराया, आशफ खां को धूल चटाई

रानी दुर्गावती द्वारा प्रस्ताव निर्भीकतापूर्वक अस्वीकार करने के पश्चात अकबर ने गोंडवाना पर आक्रमण हेतु आशफ खां को सेना के साथ भेजा। रानी ने आशफ को युद्ध मैदान में धूल चटा दीं, उसे प्राण बचाकर भागना पड़ा। युद्ध में तीन हजार मुगल मारे गये। 23 जून 1564 को आशफ खां ने दोगुना वेग से रानी के राज्यक पर पुन: आक्रमण किया। रानी ने जबलपुर के पास नरई नाला के किनारे शत्रु का प्रतिकार किया। रानी दुर्गावती के सैनिकों ने मुगलों को गाजर-मूली की तरह काटा। रानी जिधर जातीं, उधर शत्रु की लाशें बिछा देती थीं। वह दोनों हाथों से तलवार चलाना जानती थीं।

रानी की वीरता

24 जून के युद्ध प्रारंभ में रानी दुर्गावती वीरता से लड़ रही थीं, तभी अचानक एक तीर उनकी एक भुजा में आ लगा। रानी तनिक भी विचलित नही हुईं और उन्हों ने तीर शीघ्र ही निकाल कर फेंक दिया। तीर के लगने और तीर निकालने में जितनी देरी हुई, उसका लाभ शत्रु पक्ष ने उठाया। रानी संभल पातीं कि इतने में ही एक और तीर उनकी आंख में आ लगा। रानी ने बड़ी वीरता और धैर्य का परिचय देते हुए उसे भी निकाल दिया, पर कहा जाता है कि उस तीर की नोंक आंख में ही धंसी रह गयी। रानी अभी इस आघात से संभल भी नहीं पायी थीं कि इतने में ही तीसरा तीर गर्दन में आ लगा।

आत्म-सम्मान में भोंक लीं कटार

परिस्थिति विपरित देखते ही रानी ने मंत्री आधारसिंह से आग्रहपूर्वक कहा कि मेरी गर्दन काट दें। वह नहीं चाहती थीं कि शरीर किसी शत्रु की तलवार से निढाल होकर धरती पर गिरे। आधारसिंह की असमंजस स्थिति को भांपकर उन्होंने स्वयं अपनी कटार से आत्म बलिदान कर दिया। रानी की आयु इस समय लगभग 40 वर्ष थी।

रानी का बलिदान

40 वर्ष की आयु में 24 जून, 1564 को जबलपुर के पास बरेला स्थित नरई नाला के समीप बारहा की पहाड़ी की तलहटी मंडला मार्ग पर आशफ खां से युद्ध करते हुए उन्होंने अपना बलिदान कर दिया था। इस युद्ध में 3000 मुगल मारे गये थे। रानी दुर्गावती के वीरगति के बाद पुत्र वीरनारायण ने मुगलों से लोहा लिया, लेकिन सेना के अभाव में टिक न सके। आशफ खां से से लड़ते-लड़ते उन्होंने भी अपना सर्वश्रेष्ठ बलिदान कर दिया।

रानी की समाधि

जबलपुर से कुछ किलोमीटर दूर बरेना गाँव में श्वेत पत्थरों से रानी दुर्गावती की समाधि बनी हुई है। रानी मुगलों से युद्ध में आर-पार की लड़ाई लड़ीं, कभी समझौता नहीं किया। उन्होंईने यह लड़ाई भारतीय अस्मिता के लिये लड़ी। जितने भी हिंदू वीर रानी के साथ थे, सभी ने इस युद्ध को देश के सम्मान और नारी शक्ति के सम्मान के लिये लड़ा। भारत में अब तक के मुस्लिम सुल्तानों या बादशाहों से भारत के योद्धाओं ने जितने भी युद्ध किये थे, वे वास्तव में देश के सम्मान और नारी-शक्ति के सम्मान के लिये ही लड़े गये थे।

 

दरबारी

• महेश ठाकुर – पुरोहित
• आधार सिंह – दीवान
• मियां भिकारी रूमी – गढ़पाल
• रामचेरी – नारी वाहिनी प्रमुख व सहायिका
• अर्जुनदास वैश्यम – नागाधिपति
• मुबारक खाँ, कुवँर कल्यााण – वाहिनी सेनापति

रानी की वीरता पर कुछ चर्चित टिप्पणियां

विन्सेंवट स्मिथ:- दुर्गावती जैसी सतचरित्र और भली रानी पर हुआ अकबर का आक्रमण साम्राज्यवादी व न्याय संगत नहीं था।
अबुल फजल, आईन-ए-अकबरी:- दुर्गावती के शासन काल में गोंडवाना इतना समृद्ध था कि प्रजा लगान का भुगतान स्वर्ण मुद्राओं और हाथियों के रुप में करती थी।

Bishop Eyre D.D. Chattrion:- Her name should always been charished amongst the noblest of India’s daughters.

निरजाशंकर अग्रवाल:- विश्व व इतिहास में रानी दुर्गावती पहली महिला हैं, जिसने समुचित युद्ध नीति बनाकर मुगलों के विरुद्ध शस्त्र उठाकर सेना का संचालन किया वा युद्ध में आत्म बलिदान किया।

डॉ. अवध बिहारी श्रीवास्तव:- रानी दुर्गावती जिसने देश व प्रजा के सम्मान की खातिर आत्मद बलिदान देकर हमें सम्मान से जीना सिखाया।

समकालीन कवि संत तुलसीदास ने लिखा है :

गोंड गवार नृपाल महि, जवन महामहिपाल।
साम न दाम, न भेद कछु, केवल दण्ड कराल।।

रानी की वीरगाथा को रेखांकित करते हुए शंकर दयाल भारद्वाज ने लिखा है :

स्वाभिमान से भरी हुई, करूणा की कीर्ति कहानी थी,
दुर्गावती गोंडवाना की रानी थी, महारानी थी।
कालिंजर में जन्मी थी वह, कीर्ति सिंह के आँगन में,
विमल कीर्ति सी फैल रही थी, कालिंजर के जन-मन में।
कन्या रत्न, रत्न सी सुन्दर, दिव्य गुणों की खानी थी
दुर्गावती गोडवाना की, रानी थी, महारानी थी।।1।।

खेल नहीं खेली बच्चों के, धनुष बाण तलवार लिया,
दिन-दिन भर वह युद्ध रचाती, लक्ष्यबेध अभ्यास किया।
उछल अश्व की पीठ चढ़ गयी, दिखती वह मर्दानी थी,
दुर्गावती गोडवाना की रानी थी, महारानी थी।।2।।

चन्द्रवंश की कीर्ति पताका, चन्द्रप्रभा सी बढ़ती वह,
बाल-किशोर अवस्था के प्रिय पायदान पर चढ़ती वह।
राजवंश में चर्चा होती, सुन्दरता अभिमानी थी।
दुर्गावती गोडवाना की, रानी थी, महारानी थी।।3।।

रिश्ते आते उच्च कुलों के, राजा-मुगलों के अधीन,
जीवन साथी नहीं चुनी वह, जो जीता हो पराधीन।
चिन्तित पिता सदा रहते थे, बिटिया की मनमानी थी।
दुर्गावती गोडवाना की रानी थी, महारानी थी।।4।।

बहुत बड़े भूपाल गुणी थे, सुन्दर तेज प्रताप लिये,
दलपतिशाह वंश में छोटे, एक यही संताप लिये।
यह विवाह कैसे कर सकते, गढ़ सिंगोर रजधानी थी।
दर्गावती गोडवाना की, रानी थी, महारानी थी।।5।।

मनियागढ़ के प्रिय जंगल में, भेंट हुई थी दोनों से,
एक-दूजे को मन दे बैठे, देख-देख कर कोनों से।
पत्रों से विचार देकर के, जीवन राह बनानी थी।
दुर्गावती गोंडवाना की, रानी थी, महारानी थी। ।।6।।

आर्शिवाद लिया था पितु का, लेकर चेरी चली प्रभा,
हुआ विवाह, गोड़वाना की, धन्य हो गई राजसभा,
देखा राज्य बहुत विस्तृत था, गढ़, पर्वत, वन सरिता को,
खेती-बाड़ी, प्रजा सुरक्षा, शिक्षा प्रिय समरसता को,
प्रजा सुखी हो, निर्भय जंगल, रानी स्वयं भवानी थी,
दुर्गावती गोंडवाना की, रानी थी, महारानी थी।।7।।

इसी बीच प्रिय पुत्र जनी थी, परम सुखी थी अपनों में,
राम राज्य की दिव्य कल्पना, सफल हो रही सपनों में,
किन्तु भाग्य में और लिखा था, दलपति रूग्ण हये भारी,
दैव प्रार्थना, वैद्य चिकित्सा, बनी सेविका पर हारी,
विधवा होकर नहीं जिऊंगी, राजा ने तब शपथ लिया,
पुत्र, प्रजा का पालन करना, कर्म करो यह सुपथ दिया,
घोर विपत्ति भंवर में रानी, किन्तु महा मर्दानी थी,
दुर्गावती गोंडवाना की, रानी थी, महारानी थी।।8।।

नूतन सैन्य संगठन करके, शासन करना आता था,
जो भी देखे गढ़ा मण्डला, स्वयं दंग रह जाता था,
धन, वैभव, सुख, समृद्धी थी, नवनिर्माण अनूठे थे,
ईर्ष्याे कारण कई राजगण महारानी से रूठे थे,
दुर्गावती शौर्य के आगे सबको शीष झुकानी थी,
दुर्गावती गोंडवाना की, रानी थी, महारानी थी।।9।।

दिल्ली के शासक अकबर ने, एक पत्रिका भिजवायी,
करो समर्पण राज्य करो मत, ऐसी धमकी दिलवायी,
दुर्गा सा उत्तर देकर के, अपनी बात बतानी थी,
दुर्गावती गोडवाना की, रानी थी, महारानी थी।।10।।

नही अरब पर हमने कोई, कभी युद्ध करने भेजा,
बाहर से आकर दो धमकी, अकबर यह तो है बेज़ा,
हिन्द स्वयं असंगठित होकर, क्यों गुलाम बनता जाता?
लगता तुम्हें भारतीयों को, नही युद्ध करना आता,
नही झुकी हूँ, नही झुकूँगी, भैरव संग भवानी थी,
दुर्गावती गोडवाना की, रानी थी, महारानी थी।।11।।

दोनों हाथों में तलवारें, रण-भैरवी सजी रानी,
गज पर चढ़ी युद्ध करने को, काली सदृश बनी रानी,
घर-घर सेना, जन-जन योद्धा, मैं भी तो आता रानी,
दुर्गावती गोंडवाना की, आज हुई मातारानी,
जीतेगें तो वर्तमान है, बलिदानों का तो इतिहास,
जीकर-मरकर हर प्रकार से, होगा अपना यशोकाश,
जियें देशहित, मरें देशहित, यह संकल्प दिलानी थी,
दुर्गावती गोंडवाना की, रानी थी, महारानी थी।।12।।

बल से, छल से, और तोप से, नही हारती वह रानी,
एक बार तो जीत चुकी थी, रणचंडी बन वह रानी,
नरई-नाला बहुत भर गया, अपनों का छल फूट पड़ा,
कैसे पार करे अब रानी, जैसे कुत्सित काल खड़ा,
सेनापति भी पास खड़े थे, लिये कालिंजर की कटार,
चारो ओर मुगल सेना थी, पानी के कारण थी हार,
स्वाभिमान से मृत्यु वरण, करने को कहती रानी थी.
दर्गावती गोंडवाना की, रानी थी, महारानी थी।।13।।

सेनापति रो पड़े, नही माँ, मृत्यु नही मैं दे सकता,
इतना बड़ा घोर अपयश मैं, कैसे सिर पर ले सकता,
पुण्य कार्य है, सेनापति जी, यह इतिहास हमारा है,
देखो पश्चिम मे जौहर का, कैसे शुचि उजियारा है,
ले अंकुश को स्वयं वक्षपर भोंक लिया जगरानी थी,
शोणित से इतिहास लिख दिया, कैसी अमिट कहानी थी,
भारत के स्वर्णिम पृष्ठों में, पावन कथा पढ़ानी थी,
दुर्गावती गोंडवाना की, रानी थी, महारानी थी।।14।।

स्वाभिमान से भरी हुई, करूणा की कीर्ति कहानी थी।
दुर्गावती गोंडवाना की रानी थी, महारानी थी।

(यह लेख सेंटर फॉर सोशल स्टडीज, भोपाल से जारी है।)

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