डा शैलेन्द्र सिंह

बात 1985 से शुरू हो तो अच्छा रहेगा, कांग्रेस पार्टी की स्थापना के 100 साल के अवसर पर 400 लोकसभा सीटों के बंफर जीत के साथ प्रधान मंत्री बने राजीव गांधी जी ने 90 मिनट का शानदार भाषण दिया।। भाषण में उन्होंने अपनी पार्टी के भीतर के कुछ नेताओं को सत्ता का दलाल कहा और उन्हें देश के अंदर विकास और पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं के विकास का अवरोधक बताया और उनपर आरोप लगाया कि वे पार्टी के कार्यकर्ताओं के कार्य को प्रभावित कर रहे है। बस क्या था उस समय कांग्रेस के एक जाति के नेताओं को यह बात खटक गयी और इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद पार्टी के कार्यकारी अध्य्क्ष रहे पंडित कमलापति त्रिपाठी ने एक पेज का चिट्ठी कांग्रेस के अध्यक्ष राजीव गांधी को लिखा। लिखते वक्त उस चिट्ठी के माध्यम से उन्होंने पूछा कि आप जिसे सत्ता का दलाल कह रहे है वो कौन है वो जो वर्षों से कांग्रेस पार्टी की सेवा कर रहे है वो है या जो लोग कांग्रेस पार्टी की बिना सेवा किये सत्ता का मज़ा ले रहे है ।राजीव को पत्र प्राप्त हुआ और सूचना भी कि यह पत्र मुख्यरूप से प्रणब मुखर्जी द्वारा लिखा गया है,कमलापति त्रिपाठी तो एक हथियार के रूप में प्रयोग हुए है,तो फिर क्या था अरुण नेहरू और वी.पी.सिंह से सलाह के बाद प्रणब मुखर्जी को कांग्रेस से अलविदा कर दिया गया। लोग कहते है कि वही वो दौर था जब देश में समाजवादी आंदोलन अपने रुआब पर था और देश मे पिछड़े वर्ग को संवैधानिक अधिकार की बात करने वाले मंडल आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा प्रारम्भ हो गयी थी और कांग्रेस पार्टी में भी एक धड़ा पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का हिमायती हो गया,उसमे राजीव गांधी और विश्वनाथ प्रताप सिंह दोनों लोग थे।

इसी बीच जब राजीव गांधी जी ने विश्वनाथ प्रताप सिंह को औद्योगिक घरानों पर कड़ी कार्यवाही हेतू वित्त मंत्रालय से हटा कर रक्षा मंत्री बना दिया तो दोनों के बीच खाई बढ़ गयी । बोफोर्स का भूत विश्वनाथ प्रताप सिंह पर चढ़ गया और तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव की संलिप्तता पर तलवीन सिंह की पत्रकारिता ने हलचल मचा दिया।।देश में नारा लगने लगा “मिस्टर क्लिन, मिनिस्टर क्लीन नकली क्यों है तोप मशीन” लेकिन कारगिल युद्ध में उसी तोप ने विजय दिलायी हालांकि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कभी तोप की क्षमता पर सवाल उठाया ही नहीं था। इस विवाद के बाद राजा साहब ने रक्षा मंत्रालय से त्यागपत्र देकर कांग्रेस के भ्रस्टाचार ख़िलाफ़ देश भर में आंदोलन छेड़ दिया,उस समय देश भर में JP और लोहिया के चेलों का भरपूर समर्थन मिला। नारा लगने लगा “राजा नहीं फ़कीर है देश की तक़दीर है।” आम चुनाव हुए,जनता दल देश की सबसे बड़ी पार्टी बनी और भारतीय जनता पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग से सरकार बनी,साथ ही देवी लाल और चंद्रशेखर को मात देकर राजा साहब देश के प्रधानमंत्री बने।।वो उस समय देश मे भ्रष्टाचारी लोगों के लिए काल के प्रतीक थे। अब प्रधानमंत्री के सामने तीन प्रकार की विचारधारा को सामंजस्य में लेकर सरकार चलाना था। भाजपा,कम्युनिस्ट और समाजवादी जो असंभव सा था राजा साहब इन विचारों को अपने से दूर रखकर आर्थिक सुधार और करप्रणाली के सुधार में लगे थे तो उनके सरकार के आंतरिक विद्रोही उनकी ख़िलाफ़त में गुटबंदी कर रहे थे,उसमें देवीलाल और चंद्रशेखर का नाम सबसे ऊपर था। अचानक एक दिन ऐसा आया कि देवीलाल ने एक मंच पर देश के पिछड़े नेताओं को किसानों की समस्याओं पर एकत्र करके प्रधानमंत्री पर दबाव बनाने की योजना बनाई। लोग कहते है कि राजासाहब, प्रधानमंत्री कि कुर्सी बचाये रखने के लिए मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का फैसला सार्वजनिक किया। वो ऐतिहासिक फैसला जिसके द्वारा आज पिछड़े वर्ग के लोग 27 प्रतिशत आरक्षण का लाभ लेते है । अब राजासाहब तो है नही लेकिन कई पिछड़े नेता वाहवाही लूटने का प्रयास करते हुए कहते है कि उनलोगों ने इसके लिए दबाव बनाया था। उसके बाद कमंडल की आड़ में भाजपा ने राजासाहब से समर्थन वापस लिया और सरकार गिर गई। विश्वनाथ प्रताप सिंह पर बेहमई कांड के बाद देश के पिछड़े नेताओं ने बेहमई में पुलिसिया आतंक को लेकर जाति वादी होने का आरोप लगाया,वो नेता आज जिंदा भी है। तो क्या प्रश्न उठता है कि राजासाहब ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का फैसला किसी दबाव में लिया था या राजनैतिक लाभ के लिए लिया था?
लेकिन गहराई में जाने पर हमें राजीव गांधी के 1985 वाले भाषण को सुनना चाहिए और खुद राजा साहब की जुबानी 2003 में मैने अपने कान से सुना था जो लिख नही सकता । असलियत यह थी कि सामाजिक ताने बाने को राजा साहब बहुत समय से ऑब्सर्व कर रहे थे और समय की नजाकत को भाप कर उन्होंने वो फैसला लिया था और जीवन मे कभी भी उन्होंने इसका राजनैतिक लाभ लेने का प्रयास भी नही किया । उनकी एक कविता उनके दर्द को बयां करती है।

मुफ़लिस से ,अब चोर बन रहा हूँ मैं
पर, इस भरे बाज़ार से
चुराऊँ क्या?
यहाँ वही चीजें सजी हैं
जिन्हे लुटाकर
मैं मुफ़लिस बन चुका हूँ।

समय बिता सामाजिक न्याय के झण्डा बदारों ने वंशानुगत लोकतांत्रिक प्रणाली की नींव राजासाहब के छाती पर मूंग दर के स्थापित कर लिया , लेकिन राजासाहब की संतानों ने राजनीति की ओर कदम भी नही रखा । देश में समानता और समता स्थापित करने में राजा साहब का स्थान अम्बेडकर से कम नही है | राजासाहब देश की 50 प्रतिशत जनसंख्या को आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान अपने खुद के राजनैतिक बलि देकर किया, लेकिन पिछड़े वर्ग के नेताओं और जनता ने बस उनकी जाति या जमात का न होने के कारण वो सम्मान नहीं दिया जिसके वो हकदार है।

(Dr. Shailendra Singh,Post Doctoral Fellow,Centre for Bhojpuri Studies,Banaras Hindu University,Varanasi)

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