आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण

“मत कहो आकाश में कोहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।”

दुष्यन्त कुमार का यह शेर गत कई दिनों से भीतर कौंध रहा है। आलोचना को व्यक्तिगत बना दिये जाने की ‘पॉलिटिक्स’ और व्यक्ति को आलोचनातीत बना देने का ‘मैकेनिज्म’ कितना सुदृढ़ रूप ले चुके हैं ये समझना भयावह है। राजनीति में यह विचलन काफी पुराना और इसीलिये किसी हद तक परिचित-स्वीकृत हो चला था, त्रासद वह भी था लेकिन आश्चर्यजनक नहीं। परन्तु बीते कुछ दिनों में एक बिन्दु पर छिड़ी आलोचना से उभरे पक्ष-विपक्ष में आलोचना को निन्दा के आभास से विरूपित कर अपने को बचाने की जो लड़ाई सामने आयी है,वह स्तब्धकारी है।

पतन के अनेक प्रसंगों के बाद भी लोक में जो चीज अबतक समादृत रह सकी है वह है सनातन धर्म की आस्था परम्परा।

राहु-रावण और कालनेमि की कथायें तो आयीं लेकिन वो इस देश की आस्था का मूलोच्छेद न कर सकीं। तीर्थों पर आक्रमण हुये , सामूहिक रूप से मूर्तिभंग तो हुआ पर समष्टि का मनभंग न किया जा सका। सोमनाथ से लेकर रामजन्मभूमि तक दमन के चक्र चले फिर भी देवत्व की चमक न मिटायी जा सकी। अनादि आस्था से अभिभूत इस देश ने अपने नाम-रूप के अनेक विपर्यय सहकर भी अपनी सनातनता को सँजोये रखा।

यह समझना और समझाना नितान्त कठिन हो सकता है कि एक आभासी स्वतन्त्रता जो इस देश को किसी ‘प्रीमैच्योर’ बच्चे की तरह मिली थी उसे तिहत्तर वर्षों के महँगे पोषण से भी आत्मनिर्भर न बनाया जा सका।

मैं इस बराबर गूँजते शोकगीत के भीतर अभी नहीं जाना चाहता। आज तो मुझे बस यह पीड़ा असहज कर रही है कि पराधीन भारत ने कभी जो गीत गाये थे,और जिन गीतों का स्वर-सन्धान इस देश का प्राणायाम बन गया था, आज इस स्वाधीन (जैसा कि कहा जाता है) भारत के गवैये उसी गीत के स्वरों को झुठला रहे हैं।

सनातन वैदिक परम्परा की आर्यभूमि भारत को जब आगन्तुक विदेशियों ने हिन्दुस्तान कहा था,तब उनकी कल्पना भी न रही होगी कि किसी दिन यह आर्यभूमि ऐसी निःस्व हो जायेगी कि हिन्दू अभिधान ही अप्रासंगिक हो जायेगा। ये सोचने और सोच-सोचकर मर जाने की बात हो सकती है कि अ़फगानिस्तान,तुर्कमेनिस्तान , कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान वाले विश्व में अहिन्दुओं ने किसी भूभाग को हिन्दुस्तान क्यूँ कहा था। और भले न सोचा जा रहा हो ,पर सोचने की बात यह भी है कि एक टुकड़ा तोड़कर पाकिस्तान बनाने की मजबूरी भी कैसे उपजी थी। जाहिर है कि समूचे हिन्दुस्तान का नामान्तरण सम्भव नहीं था।

जेएनयू से पहचान पाते नागवार नारे,जेहादियों से जड़ें जमाती गैरराष्ट्रीयता की धर्माभासी धमक और राजनीति से रोग की तरह फैलती चरित्रहीन चालाकी इस आर्यभूमि की सनातनता को अपने में ही सिमट जाने के लिये विवश करती ही जा रही है।

पेट की आग में झुलसे चेहरे अपनी पहचान के वैश्विक होने का भ्रम फैलाने में व्यस्त हैं। उनके पास कोई दर्पण नहीं जिसमें उन्हें अपनी पहचान में निहित सर्वग्रासी और भयावह भूख दिख सके।

भ्रम उनका भगवान है और धोखा उनका धर्म।

वे पण्यजीवी हैं,जाति-गोत्र-कुल को कलंक की तरह त्याग चुके। चमक को चरित्र की तरह प्रतिपादित करते हुये उनके शास्त्र परम्परा का परिष्कार नहीं सहते। वे वाद को विवाद और विमर्श को वितण्डा में धकेल देते हैं ,और उनके ‘फॉलोवर्स’ उनकी जीत की घोषणा कर देते हैं जो उनकी ‘जरखरीद’ है।

ये सब कुछ नया नहीँ था,पर इस हलके में नया है अवश्य।

आनन्द मठ के सन्यासी योद्धाओं का गीत उन्हीं के बलिदान से स्वतन्त्र हुये बहुतेरे लोगों को स्वीकार नहीं है। ‘क्यों ?’ ये अतिप्रश्न है जिसे पूछते ही प्रश्नकर्त्ता के सिर के हजार टुकड़े हो सकते हैं।

जनगणमन में अधिनायक को भाग्यविधाता बताने वाली आत्महन्ता आस्था राष्ट्रगान कैसे बनी ये भी पूछना पाप है।

भारत जो हिन्दुस्तान हो चुका था , उसके भजन अपने हिन्दुत्व का भार ढोने लायक भी क्यूँ न रहे ये पीड़ा तो प्रश्न भी न बन पायी।

‘भद्रगिरीश्वर सीताराम’ अपनी ईश्वरता का सुबूत खोजते-खोजते कब अल्लाह के गले जा लगे यह भी उस महात्मा ने कभी न बताया जिसने भारत को माता बना दिया।

दिन-ब-दिन विह्वल होती जाती उसी आस्था ने जब एक नेता को पिता कहा तो कोई आश्चर्य न हुआ। राष्ट्र ने इसे गाली बिलकुल न समझा।

लेकिन आखिर “कोई नश्शा हो टूट जाता है ,कब तलक खुद को बेखबर रखिये।” नशा टूटा और एक दूसरे महाभारत की तरह धर्मराज के कथन को कृष्ण की शंखध्वनि ने सच-झूठ की धुन्ध का परदा दे दिया ‘हे राम।’ ये देश पीढ़ियों से उसी ‘हे राम’ से अपने पाप धो रहा है। संकेत , परिहास अथवा हेला कुछ भी हो ‘हे राम’ तो है, और फिर शंखध्वनि में साफ सुनाई भी कहाँ देता है भला ! गोली की आवाज की बात और है। उससे नशा उतरा नहीं लेकिन टूटा जरूर।

पर ये सब घाव पुराने पड़कर भी हरे हो आये हैं , जब एकबार फिर से वही आत्महन्ता आस्था हमारी पहचान की बलि माँग रही है।

बोतलबन्द जिन्न को बाहर लाने वाला फकीर बलिदान से मुकरने वालों को मूढ़,नास्तिक,आस्थाविहीन और अपराधी साबित करने का अमल कर रहा है।

पल-पल सिमटते प्राणों और सुन्न पड़ती जाती अपनी काया वाला
देवतात्मा देश अपने स्वरूप को बचाने की गुहार लगाकर असहिष्णुता के आरोप से सन्न है। दुबारा आवाज देने की बजाय वो अब अपनी आवाज की सचाई ढूँढ रहा है जिसे हर बार नकार दिया जाना है।

एक देश,एक राष्ट्र,एक समाज,एक संस्कृति,एक परम्परा,एक विश्वास-एक अनुशासन ये सब

अपनी ही भूमि में अपने ही लोगों द्वारा अप्रासंगिकता के यक्षप्रश्नों में घेर दिये गये हैं। जो मुक्ति का आन्दोलन करेंगे उन्हें शाप दे दिया जायेगा। जो साथ आयेगा उसको जागीरें बख्शी जायेंगी, मर्तबा अता किया जायेगा,परवाने तैयार हैं।

इस पूरी त्रासदी का सबसे दारूण पक्ष है गुलामों की फौज,जिसने जिन्न को ही अपना आका मान लिया है। मिट जाना जिसके लिये जन्नत है और जागना कुफ्र। आस्थाओं में अपने प्राण रखकर निश्चिन्त हुये भारत पुरुष को पता ही न चला कि उसकी आस्था कब आत्महन्ता हो चली।

कब उसकी कथाओं के देवता अतीत हो गये,कब समय की माँग ने उसके आत्मधर्म को सर्वधर्म से ‘रिप्लेस’ कर दिया।

ठगा हुआ जन और बुझा हुआ मन नायकत्व के स्वीकार-अस्वीकार से बड़े प्रश्नों का सामना करने को तैयार नहीं।

आजीविका की चिन्ता में जीवन अचिन्त्य हो गया है।

महानताओं के खण्डहर हो जाने का दुःख हमारी पीढ़ी के माथे पड़ा है।

सच को सामर्थ्य की साक्षी का मोहताज बनाकर हमने अपनी कथाओं को भिक्षुगीतों में ढाल दिया है। अब अपराध लीलायें हैं और क्षमायाचनायें उनके पुण्यपर्व।
हमारे शास्त्र संशोधन की सूचिकाओं से बिंधे हैं और हमारी शिक्षावल्ली स्वैरिणी हो गयी है।

जब देश दिशाहीन और बन्धुता वञ्चित है , तो मैं पुकारना चाहता हूँ कि ओ देशबन्धु जागो! अपनी कथाओं का तत्त्व खोजो! अपनी आस्थाओं को पहचानो! और तन्त्र से पराभूत् जन को अधिनायकत्व के अभिशाप से मुक्त कराओ।

● पिता चुने नहीं जाते
● गुरु खड़ाऊँ को नहीं कहा जाता
● और सत्य मंच-माइक से आविर्भूत नहीं होता।

यह लेख इदमित्थम् के फेसबुक पेज से लिया गया है। लेख में लेखक के निजी विचार हैं।

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