भोपाल, 30 मई। भारतीय साधना, योग व ज्ञान परंपरा में काल के रहस्य की जानकारी उपलब्ध है। भारत ही एक मात्र देश है जिसने ज्ञान को संस्कृति बनाया और इसे आम जन के लिए उपलब्ध कराया। शिव के हाथों में डमरू व त्रिशूल, गले में सॉप, उज्जयिनी में महाकाल मंदिर, संत परंपरा के माध्यम से काल को आसानी से समझा जा सकता है। स्टिफिन हॉकिंग की टाइम एंड स्पेस थ्योरी शिव की डमरू पर ही आधारित है। भारत के चित्त में काल की परंपरा है। भारतीय ज्ञान परंपरा में समय की धारणा एक रेखा में नहीं है। वस्तुतः वह सर्पाकार है। इसमें दो पलों के बीच अंतराल है।

यह बातें शनिवार को दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान के तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय वेबीनार ‘रिविजिटिंग सेंट्रल इंडिया’ के तृतीय सत्र को संबोधित करते हुए लेखक और फिल्म निर्देशक संगीत वर्मा ने कही। इस चार दिवसीय वेबीनार के तीसरे दिन ‘शून्य और काल : भारतीय विज्ञान दृष्टि एवं उज्जयिनी’ विषयक सत्र में उन्होंने शून्य को लेकर कहा कि जब शून्य की घटना घटती है तो देखने वाला कोई नहीं बचता है। शून्य संपूर्णता है, उसमें सबकुछ निहीत है। शून्य में सृष्टि को प्रकट करने की क्षमता है, जबकि पढ़ाई-लि‍खाई में बताया गया कि शून्य का मतलब कुछ नहीं है। उन्होंने बताया कि ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को लेकर बिग बैंग थ्योरी भी कहती है कि पहले कुछ नहीं था। पश्चिम के चिंतन में संपूर्णता नहीं है, जबकि भारतीय ऋषियों ने वर्षों पहले बता दिया है कि शून्य ही है जो पूर्ण है।

काल की तरह साँप की गति

काल यानि समय की भारतीय अवधारणा पर बोलते हुए श्री वर्मा ने कहा कि भारत के लोक जगत में साँप को काल कहा गया है, क्योंकि साँप की गति काल की तरह है। पूरा विश्व शोध कर रहा है कि सृष्टि के आरंभ होने से पहले क्या था, उस समय की घटना क्या थी।

काल एक अद्वैत प्रक्रिया, भारतीय संत परंपरा में है पुष्टि

उन्होंने बताया कि काल का क्रम चलता रहेगा। यह एक अद्वैत प्रक्रिया है। इसकी छाया भारतीय संत परंपरा के अघोरी ऋषियों में देखने को मिलती है। ये लोग जाड़े के मौसम में बिना वस्त्र के रह सकते हैं और गर्मी में कंबल ओढ़ के रह सकते हैं। अर्थात वे द्वैत की भावना से उपर उठ रहे होते हैं या उठ चुके होते हैं। एक अघोरी अपने भीतर से द्वैत की भावना को समाप्त करना चाहता है। गीता में कृष्ण भी कहते हैं कि लाभ-हानि, सुख-दुख में सम हो जाओ तो तुम मुझे प्राप्त हो जाओगे।

काल-गणना में है उज्जयिनी व महाकाल मंदिर का महत्व

उज्जयिनी के वैज्ञानिक महत्व पर बोलते हुए संगीत वर्मा ने कहा कि उज्जयिनी महाकाल की नगरी है। इस नगरी का काल-गणना में महत्व है। 20 हजार 500 वर्ष में एक बार ऐसी घटना होती है कि महाकाल मंदिर के शिखर पर कर्क रेखा होती है और कर्क में संक्रांति होती है। यह एक अभूतपूर्व घटना होती है। जिस वर्ष कर्क रेखा आती है, उस वर्ष सूर्य दक्षिणायन होते हैं, जिस पल दक्षिणायन होते हैं, वह पल दोपहर के 12 बजे होता है। इसी समय सूर्य कर्क रेखा में प्रवेश करते हैं। जब उज्जयिनी में 12 बजे होते हैं, उसी पल नार्थ पोल पर भी दोपहर का 12 बजा होता है और साउथ पोल पर रात्रि का 12 बजा होता है। यही एक पल होता है, जब सटीक खगोल गणनाएं की जा सकती हैं। पृथ्वी पर उज्जयिनी व महाकाल एक मात्र बिन्दु है, जहां कर्क रेखा पर घटना घटती है। इसलिए उज्जैन को पृथ्वी की नाभि भी कहा जाता है।

कार्यक्रम संयोजक संस्थान के निदेशक डॉ मुकेश कुमार मिश्रा ने कहा कि अवंतिका उज्जयिनी का उल्लेख भारत की सभी धाराओं में विद्यमान है। वोद से लेकर बौद्ध, जैन ग्रंथों एवं पुराणों में उज्जैन का महत्व बताया गया है। वेबिनार में संगीत वर्मा ने पीपीटी व विडीयो के माध्यम से शून्य, काल व उज्जयिनी की तकनीकी बिन्दुओं को बारीकी से समझाया। कार्यक्रम में देश भर के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों, संगठनों से जुड़े लोगों के अलावा, विद्यार्थी, शोधार्थियों की उपस्थिति रही। साथ इस्राइल, हंगरी एवं फ्रांस में बसे हुए कुछ भारतीय नो भी सहभागिता की।

Leave a Reply