राहुल कुमार दोषी

बेबाक होना बदनाम होना है। मंटो इसलिए बदनाम थे क्योंकि समाज को हूबहू कागज पर उतार रहे थे; सच को स्याही प्रदान कर रहे थे और बता रहे थे कि सभ्यता की आड़ में हमलोग कैसे हैं। इसी कारण मंटो पर अनेकों पाबंदियां लगाई गईं। मंटो पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगा। मंटो से साहित्यकार का दर्जा छीनने की कोशिश लगातार होती रही।

मंटो पर मुक़दमा भी चला। चार मुकदमे ब्रिटिश काल में हुआ जबकि एक मुकदमा स्वतंत्र पाकिस्तान में। लेकिन सभी में निर्दोष साबित हुए। सच पूछिए तो मंटो का मकसद समाज को आइना दिखाना था ना कि समाज को बिगाड़ना। बिगड़े हुए समाज को कोई साहित्यकार आख़िर बिगाड़े तो क्यों बिगाड़े! सच को पचाने की क्षमता ना रखने वाले समाज को सच कहने वालों से दुश्मनी होता ही है, समाज का एक बड़ा हिस्सा मंटो को दुश्मन ही समझता था।

दरअसल हमारा समाज दकियानूस रहा है। हैं कुछ, दिखाएंगे कुछ! सोच कुछ और, हकीकत कुछ और! प्रथा, परम्परा और पुरुष प्रधान मानसिकता हमेशा से हावी रही है। साम्प्रदायिकता अभी भी जारी है। महिलाओं की स्थिति कागज पर सुधरी है। मंटो इन्हीं सब मुद्दे को अपनी रचना संसार का विषय बनाते रहे, इसलिए बदनाम होते रहे। साहित्य के क्षेत्र में ज्यादा नहीं एक और मंटो हो जाए तो मज़ा आ जाए! समाज की बदबुओं को साहित्य में दिखाना अतिआवश्यक हो गया है।

इंसानी पशुता को जिस स्तर तक मंटो ने उजागर किया शायद ही कोई साहित्यकार कर पाएगा। मंटो में तमाम मुद्दे को कहने का मद्दा था और असलियत को लिखने की क्षमता थी। शायद इसलिए मंटो को बदनाम साहित्यकार कहा जाता है। वैसे मंटो खुद मानते थे- “सच को चाहे शक्कर में ही क्यों न डुबो दिया जाए, उसकी कड़वाहट कम नहीं होती।” मंटो के प्रति कड़वाहट जबरदस्त थी। सच्चा पत्रकार हो या रचनाकार; कड़वा तो होते ही है जनाब।

मंटो को पढ़ने के बाद लगता है कि कबीरदास गद्य लिख रहे हैं। बिल्कुल सच्चाई से ओतप्रोत पंक्तियाँ! संस्कृति में मौजूद छेद को उघाड़ने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते हैं। मंटो की एक ही शैली है- सच की शैली। इसी के द्वारा वह सबसे अधिक पढ़े जाने वाले साहित्यकारों की श्रेणी में शामिल हैं।

मंटो की रचनाओं में ठंडा गोश्त, बू, धुआँ, काली सलवार, खाली बोतलें, गंजे फरिश्ते, पर्दे के पीछे, बुर्क़े, शैतान, शिकारी औरतें और सड़क के किनारे खासे चर्चित हैं। मंटो अपने तमाम रचनाओं में समाज के खोखलेपन को उजागर करते हैं। मंटो का मानना था- “कलम आज़ाद है और शब्द भी, फिर लेखक कैद क्यों?”

गौरतलब है कि समाज में मौजूद विसंगतियाँ और बुराइयाँ कोई गुलाब का फूल नहीं कि सूँघते रहो! एक ज़िन्दाबाद रचनाकार तमाम विसंगतियों एवं बुराइयों को अपनी रचनाओं के द्वारा दुनिया के सामने लाता है; मंटो भी यही किया। रूढ़िवादी और संस्कृति के दलालों को ही कबीर, मंटो, नागार्जुन, अदम गोंडवी, मुक्तिबोध, यशपाल, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी और अज्ञेय जैसे साहित्यकारों से चिढ़ होती है। बाकी लोग/पाठक तो ऐसे रचनाकारों की रचनाओं को डूबकर पढ़ते हैं। खूब गोताखोरी करते हैं, और अपने लायक मोतियां निकाल लेते हैं।

एक डॉक्टर यह बता दे कि आपके पेट के अंदर एक बड़ा सा घाव है, इससे ज्यादा खुशी आपके लिए क्या होगी! पता चलते ही आप इलाज के लिए सोचिएगा या फिर डॉक्टर को ही अश्लील कह डालिएगा- क्योंकि उसने आपके पेट के अंदर झाँक लिया? यकीन मानिए, एक अच्छा रचनाकार एक बेहतरीन सामाजिक डॉक्टर होता है; वह बताता रहता है कि कहाँ, कितना, कैसे, क्यों और क्या खोट है! उसके बाद जिम्मेदारी तो आपकी है।

दरअसल किसी भी रचनाकार की रचना आपको तमाचा तब लगती है जब आप या तो सीख रहे होते हैं या फिर किसी विशेष विचारधारा से चिपक गए होते हैं। खुद को निखारने और तराशने के लिए ज़रूरी है कि देश-दुनिया के कुछ बेहतरीन रचनाकारों को पढ़ें। कुछ मौलिक रचनाकार ही दिमाग में लगे जंग को खरोंचते हैं। मंटो दिलोदिमाग को खरोंचने वाला रचनाकार है; दर्द और चुभन तो होगा ही।

धन्यवाद मंटो! आपने सच ही कहा- “मैं सोसाइटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश नहीं करता, क्योंकि यह मेरा काम नहीं, दर्ज़ियों का काम है।”

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