सत्यम भारती

‘जीवन का सबसे बड़ा कष्ट होता है किसी पर निर्भर होना,मैं अभी तक पर निर्भरता से दूर हूं, मैं सन्नाटे की दुनिया में रहता हूं,इसलिए पढ़-लिख लेता हूं’– डाॅ.नामवर सिंह का यह कथन लिखने-पढने वालों के लिए एक नसीहत थी । सांसारिक चकाचौंध और रंगीनियों में उलझ कर साहित्य नहीं रचा जा सकता है, उसके लिए खुद को आत्मनिर्भर, आत्मचेतस और आत्मनिष्ठ होकर एकांत साधना करनी पड़ती है। जब कोई विद्वान साहित्य में जीवन को और जीवन में साहित्य को देखता है तब उसकी दृष्टि युगीन और लोक से संबंध रखने लागती है, कुछ ऐसी ही दृष्टि नामवर सिंह की थी। रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद दिवेदी के बाद हिंदी आलोचना में किसी का नाम आता है तो वो हैं नामवर सिंह। प्रगतिशील आलोचना को सक्रिय आंदोलन के रूप में इन्होंने ने विकसित कर साहित्य में युवा और उनकी रूचि को जागृत करने की सफल कोशिश की। उन्होंने आलोचना की शुरुआत अपभ्रंश तथा प्राचीन साहित्य से की फिर परंपरा को सलीके से जान कर नवीन साहित्य की आलोचना की, इस प्रकार हम देखते हैं कि उनकी आलोचना में प्राचीनता और नवीनता का द्वंद्व और सामंजस्य दोनों एक साथ दिख जाती है।

वे हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन की मांग करते हैं तथा ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टि अपनाने पर जोड़ भी देते हैं। छायावाद पर लिखी गई उनकी पुस्तक वर्षों से चल रहे विवाद का तर्कसम्मत उल्लेख कर इसे सांस्कृतिक और समाजिक आंदोलन के रुप में व्याख्यायित करते हैं तो वहीं प्रगतिशील आंदोलन को सिर्फ आंदोलन न बता कर उसको समाजिक जरूरत भी सिद्ध करते हैं। इनकी आलोचना की एक खास विशेषता है कि वे समस्याओं को तर्क से उलझाते हैं बिना किसी पूर्वाग्रह के, वहीं सूक्ति पूर्ण और प्रतीकात्मक भाषा शुक्ल की याद दिलाती है। हिन्दी आलोचना के प्रधान स्तम्भ नामवरजी को मृत्यु का अभास पहले ही हो गया था,इसलिए वो अपने अंतिम इंटरव्यू में कहा था- मैं मरूंगा सुखी, मैने जीवन की धज्जियाँ उड़ायी है। ये पंक्ति अज्ञेय की है जो आधुनिक सोच और अस्तित्ववादी कवि थे। बनारस के छोटे से गाँव से निकल बीएचयू से उच्चशिक्षा प्राप्त कर वहीं प्राध्यापक नियुक्त हुए, पुनः वे जोधपुर और जेएनयू के भी प्रोफेसर बने और सेवानिवृत हुए। उन्होंने हिन्दी आलोचना को शिखर तक पहुँचाया तथा पत्रकारिता को भी मरने नहीं दिया। कविता के नए प्रतिमान, दूसरी परंपरा की खोज, कहानी नई कहानी, छायावाद, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, इतिहास और आलोचना जैसी पुस्तक लिख कर हिन्दी को समझने और जानने की एक नई दृष्टि प्रदान किये। सामसिक शैली में लिखित वाक्य जो गूढ़ अर्थो को समाहित किये रहती है, यह उनके लेखन की प्रमुख विशेषता थी। हिन्दी आलोचना में लेखनी चलाने के अलावा नामवरजी कविता लेखन(खड़ी बोली और ब्रज) तथा आलोचक पत्रिका के प्रधान संपादक भी रहे। 1971 में उन्हे कविता के नए प्रतिमान पुस्तक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया था। केदारनाथ सिंह और नामवर सिंह की जुगलबंदी और दोस्ती के किस्से आज भी बनारस के घाटों पर सुनी और सुनायी जाती है,जहाँ वे दोनों कभी चाय की दुकानों पर बैठकर साहित्य, कविता और ज्ञान का बनारसी फक्कड़पन अंदाज में त्रिवेणी बहाया करते थे। वे अपने लेखन में जितने निर्भीक और सशक्त थे उतने ही आम जिन्दगी में विनम्र और सरल। हिन्दी आलोचना के शीर्षस्थ पुरूष का जाना एक युग के अंत होने जैसा है,उनकी मृत्यु हिन्दी साहित्य के लिए अपूर्णीय क्षति है।


(लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य के छात्र हैं। लेख में उनका निजी विचार है।)

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