दिनांक 31 जुलाई 2021 को प्रेमचंद की 141वीं जयन्ती के अवसर पर क्षेत्रीय केंद्र प्रयागराज, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा प्रेमचंद और स्वतंत्रता आंदोलन विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. रजनीश शुक्ल कुलपति महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने की. कार्यक्रम के प्रारम्भ में डॉ. जगदीश नारायण तिवारी ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया. डॉ. अवन्तिका शुक्ल सह आचार्य स्त्री अध्ययन ने स्वागत वक्तव्य के साथ सभी वक्ताओं का परिचय प्रस्तुत किया. प्रो. अखिलेश दुबे अकादमिक निदेशक क्षेत्रीय केंद्र प्रयागराज ने प्रेमचंद के जीवन और साहित्य में स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जुड़ाव और गांधी के प्रभाव को रेखांकित करते हुए राष्ट्रीय परिसंवाद की प्रस्तावना रखी.

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अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीशकुमार  शुक्ल ने कहा कि प्रेमचंद पूंजीवाद की खिलाफत करते हैं. प्रेमचंद अपने वैचारिक लेखन में स्वराज, स्वदेशी, स्वशासन, स्वाधीनता की बात करते हैं. प्रेमचंद इस बात पर चिंता व्यक्त करते हैं कि गोरे अंग्रेज के बाद क्या भूरे अंग्रेज हमारे ऊपर शासन करेंगे? प्रो.  शुक्ल ने मंदिर, शुद्धि, सीता, जुलूस, समर यात्रा, शराब की दुकान, सुहाग की साड़ी, आहुति, जेल आदि कहानियों  पर चर्चा की ,जिसमें भारतीय समाज की निर्मिति की बात कही गयी है. राष्ट्र और समाज की स्वतंत्रता के सिपाही के रूप में अभी प्रेमचंद को विस्तार से देखा जाना जरूरी है. प्रेमचंद का नवजागरण भारतीय दृष्टि से ओतप्रोत है. कलम बंद नहीं होगी, नाम बदल होगी प्रेमचंद का यह संकल्प राजनैतिक और मानसिक पराधीनता से मुक्ति की लड़ाई का प्रतीक है. हिंदी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की भाषा के रूप में उभरी थी. इसलिए प्रेमचंद हिंदी को अपने लेखन की भाषा बनाते हैं.

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प्रो. कुमुद शर्मा हिंदी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय एवं निदेशक हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय नई दिल्ली   ने अपने वक्तव्य में बताया कि प्रेमचंद के लेखन और दृष्टि में साहित्य के माध्यम से देश के जागरण का प्रयास किया गया . देश भक्ति के प्रभाव में ही उन्होंने अपने नाम को भी बदल के प्रेमचंद रखा. कारण पूछने पर बताते हैं कि नबाव तो वो है जिसके पास अपना मुल्क हो और मेरे पास वह नहीं है. प्रेमचंद ऐसी सामाजिक व्यवस्था चाहते हैं जो विषमता मुक्त हो. जुलूस, सोजे वतन, शतरंज के खिलाड़ी  आदि कहानियों  और हंस, माधुरी आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के माध्यम से कुमुद जी ने राष्ट्रीय चेतना के संवाहक के रूप में प्रेमचंद की साहित्यकार और पत्रकार की दृष्टि को विस्तार से प्रस्तुत किया.

प्रो. चमन लाल गुप्त पूर्व अध्यक्ष हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय ने अपने वक्तव्य में बताया कि प्रेमचंद ने अपने जीवन में चारों ओर घटनाओं को घटित होते देखा, अनुभव किया, संवेदना के स्तर पर स्वीकार किया और फिर उसकी प्रतिक्रिया अपने साहित्य और जीवन में दी. प्रेमचंद के साहित्य में स्वाधीनता आंदोलन का विस्तार अपने विविध रूपों में मिलता है. प्रेमचंद के ऊपर किसी का दबाव नहीं था. इसीलिये उनकी रचनाओं में सहजता आसानी से मिल जाती है. प्रेमचंद ने रूसी साहित्य को बहुत पढ़ा था पर उनके भीतर एक भारतीय दृष्टि का प्रभुत्व था. स्वाधीनता के संघर्ष का समावेश प्रेमचंद के साहित्य में मिलता है. प्रेमचंद ने छुआछूत का विरोध, विधवा पुनर्विवाह, स्त्री शिक्षा, वेश्या समस्या, साम्प्रदायिकता जैसी महत्वपूर्ण सामाजिक समस्याओं को अपनी रचनाओं में प्रमुखता से शामिल किया. प्रेमचंद ने अपने लेखन को हिंदी भाषा में प्रस्तुत किया ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच में स्वाधीनता की चेतना का प्रसार किया जा सके.

प्रो. अवधेश कुमार शुक्ल अधिष्ठाता साहित्य विद्यापीठ ने अपने वक्तव्य में प्रेमचंद की जीवन दृष्टि पर बात की, जो आदर्शवादी भी है और यथार्थवादी भी, भौतिकवादी भी है और आध्यात्मवादी भी. प्रेमचंद ने गति, संघर्ष और बेचैनी की बात अपने साहित्य में की और कहा कि सोना अब मृत्यु का लक्षण है. प्रेमचंद कहते हैं कि जिस देश का साहित्यकार सोया होगा उसका देश क्या जाग्रत होगा. इसके बाद साहित्य का उद्देश्य, आज़ादी की लड़ाई, नवीन और प्राचीन, बच्चों को स्वाधीन बनाओ जैसे कई महत्वपूर्ण निबंधों पर प्रो. अवधेश कुमार ने विस्तार से चर्चा की. मंत्र कहानी की चर्चा करते हुए मनुष्य की संवेदना के अभाव और उसके विस्तार पर बात की. उन्होंने बताया कि प्रेमचंद की जान स्वाधीनता संग्राम में बसती है. स्वाधीनता आंदोलन के सभी महत्वपूर्ण लेखक पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं. एक निर्भीक योद्धा के रूप में स्वाधीनता आंदोलन के लिए प्रेमचंद ने सभी उपक्रमों को अपनाया.

प्रो. कृष्ण कुमार सिंह साहित्य विद्यापीठ ने स्वतंत्रता आंदोलन में प्रेमचंद की कलम के माध्यम से हिस्सेदारी पर बात की. कलम का सिपाही नाम रखना  ही इस बात को स्पष्ट करता  है. देसी चीजों का प्रचार कैसे बढ़ सकता है, आलेख प्रेमचंद की चिंता बताता है जो उन्होंने 25 वर्ष की अवस्था में अपने लेखन के शुरुआती दौर में लिखा था. उन्होंने देश के युवाओं को जाग्रत किया. चरैवेति चरैवेति उत्तिष्ठति की झलक प्रेमचंद के साहित्य में मिलती है.  प्रेमचन्द्र जागरण का सन्देश दे रहे थे और स्वतंत्रता संघर्ष के साथ लोगों को जुड़ने का आह्वाहन कर रहे थे. जब तक करंट अफेयर्स से लगाव न हो तब तक किसी मजमून पर लिखने की तबीयत नहीं होती, ऐसा प्रेमचंद का कहना था. प्रो सिंह ने हंस पत्रिका और रंगभूमि उपन्यास में प्रस्तुत गीत पर भी चर्चा की . होगी निश्चय जीत धर्म की यही भाव भरना होगा, मात्र भूमि के लिए जगत में जीना और मरना होगा पंक्तियों के माध्यम से प्रेमचंद के भीतर उपस्थित आजादी के मनोभावों को स्पष्ट किया. प्रो सिंह ने बताया कि प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतलाल नागर ने प्रेमचंद को कलम के फील्ड मार्शल की संज्ञा दी थी.

प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह हिंदी एवं आधुनिक भाषा विभाग ,इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने अपने वक्तव्य में बताया कि प्रेमचंद खुदीराम बोस की तस्वीर अपने कमरे में लगा कर ही लेखन करते थे. साहित्य राजनीति के आगे आगे चलने वाली मशाल है. इसी मशाल को प्रेमचंद ने उठाया .प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी छोड़ कर पत्रकारिता और सृजनात्मक लेखन के माध्यम से आज़ादी की लड़ाई लड़ी. प्रेमचंद ने विदेशी सत्ता का प्रतिपक्ष रचा है. प्रेमचंद कहते थे कि हम दैहिक पराधीनता से मुक्त होना चाहते हैं पर हम मानसिक गुलामी से जकड़ते जा रहे हैं. अतः मानसिक जकड़न पर विचार करना ज्यादा जरूरी है क्योंकि आज़ादी तो हम पा लेंगे लेकिन मानसिक गुलामी को कैसे दूर करेंगे? इसका बीड़ा भी प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं के माध्यम से उठाया.

प्रो. हनुमान प्रसाद शुक्ल प्रति-कुलपति महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने अपने वक्तव्य में बताया कि प्रेमचंद  ने किसान जीवन को केंद्र में रखा . गोदान का किसान औपनिवेशिक किसान है.  वह किसान औपनिवेशिक शासन से उपजी स्थितियों का शिकार है. उसके उद्धार के लिए, उसके दर्द और पीड़ा को सामने लाने के लिए किसान को लेखन का मुख्य बिंदु प्रेमचंद ने बनाया. वह स्वतंत्रता आंदोलन में भारतीय किसानों की शोषण से मुक्ति को प्रमुखता से रख रहे थे. इसके लिए प्रो. शुक्ल ने गोदान पर चर्चा की. उन्होंने कहा कि विचारधारा की सीमाओं में प्रेमचंद को बंद नहीं किया जा सकता. उन पर मानवतावादी दृष्टिकोण से ही बात की जा सकती है.

कार्यक्रम के अंत में डॉ. आशा मिश्रा सह आचार्य स्त्री अध्ययन ने सभी वक्ताओं एवं आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापन किया . इस कार्यक्रम में प्रो. कृपा शंकर चौबे, डॉ. रामानुज अस्थाना, , डॉ. अशोकनाथ त्रिपाठी, डॉ. सुप्रिया पाठक, डॉ. अमरेन्द्र शर्मा, डॉ. जयंत उपाध्याय, डॉ. विधु खरे दास, डॉ. हरप्रीत कौर, , डॉ. सुरभि विप्लव,  डॉ. ऋचा द्विवेदी , डॉ. जोगदंड शिवाजी, डॉ अनूप कुमार त्रिपाठी आदि अध्यापक एवं श्री विनोद वैद्य सहायक कुलसचिव,  श्री बी. एस. मिरगे जन संपर्क अधिकारी, डॉ. अंजनी राय सिस्टम एनालिस्ट , शम्भू दत्त सती,  राजदीप राठोड़ , जयेंद्र जायसवाल , अरविंद राय, मिथिलेश राय  उपस्थित थे . इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय के आधिकारिक फेसबुक और यूट्यूब चैनल पर ढेरों दर्शकों ने जुड़कर इसका लाभ उठाया .

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