वर्धा। अंतराष्‍ट्रीय स्‍तर पर पर्यावरणीय विपदा की दूरदर्शिता को देखते हुए प्राकृतिक प्रबंधन व संरक्षण अत्‍यन्‍त आवश्‍यक है। इस आशय को सहज भाव से चेतना व विमर्श हेतु संकल्प एजुकेशनल एंड सोशल कमिटमेंट सोसाइटी तथा चिल्ड्रेन्स लाइफ केयर एंड एजुकेशनल सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्‍ठी में विशिष्‍ट वक्‍ता के रूप में पद्मभूषण व पद्मश्री डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने अपने उद्गार व्‍यक्‍त किए। हिंदी की सुप्रसिद्ध प्रोफेसर डॉ. प्रीति सागर की अध्‍यक्षत में देश के अनेक मीडियाविद्, पर्यावरण चिंतकों के साथ अटलांटा से ईजीनियर बृजेश कुमार, दुबई से प्रोफेसर अनीश अली संगोष्‍ठी में शामिल हुए. के संगोष्‍ठी में उत्तराखंड से जुड़े जानेमाने पर्यावरण सेवी पद्मभूषण व पद्मश्री डॉ. अनिल प्रकाश जोशी ने आयोजन में अपनी बात रखते हुए कहा जिस तरह से देश में सरकार जी. डी. पी. को बचाती और मापती है ठीक उसी तरह से पर्यावरण में मिट्टी, पानी, जंगल और वनस्पति को मापने के पैमाने होने चाहिए। हमें सकल पर्यावरण सूचकांक को भी देखना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो धरती को बचाना कठिन होगा और वह दिन दूर नहीं जब धरती पर बीज बोया जाएगा पर उगेगा नहीं। विमर्श को आगे बढ़ाते हुए वरिष्‍ठ पत्रकार अमरेंद्र किशोर ने कहा कि हमें अगर वास्तव में पर्यावरण को बचाना है तो प्रकृति और संस्कृति दोनों के बीच सामंजस्य बैठाना होगा, यह काम अगर मीडिया करे तो पर्यावरण में बदलाव सहज संभव है क्योंकि मीडिया की पहुँच लगभग हर जगह है। अटलांटा जॉर्जिया से जुड़कर अपनी बात रखते हुए प्राकृतिक उर्जा प्रबंधन हेतु सोलर एनर्जी और विंड एनर्जी पर तकनीकी पक्ष को पर्यावरणीय संरक्षण हेतु विकल्‍प पर जोर देने की बात कही। उन्होंने कहा कि भारत में सोलर पैनल सूर्य के प्रकाश से लगभग 15% एनर्जी बनाते हैं जबकी अमरीकी कंपनी एलन मास्क द्वारा बनाये गए सोलर पैनल 40% एनर्जी बनाते हैं, इससे यह साबित होता है कि आने वाला कल सोलर ऊर्जा पर ही निर्भर करेगा।

संगोष्‍ठी में जुड़े एनडीटीवी के वरिष्‍ठ पत्रकार पत्रकार तथा रामनाथ गोयनका पुरुस्कार से सम्‍मानित सुशील बहुगुणा ने गंभीर उदाहरणों व उपयों के साथ अपनी बात रखते हुए कहा कि मीडिया में पर्यावरण प्रमुख मुद्दा बनकर नहीं उभर पाया है. इसलिए पत्रकारिता को यह मुहिम उठानी चाहिए. नदियों के प्राकृति बहाव को रोका जा रहा है वह मनुष्य को आसन लगता है लेकिन यह पर्यावरण के लिए कतई आसान नहीं होगा। उनका मानना है कि पर्यावरण विशेषज्ञों व चिंतकों को दुनिया की रक्षा के लिए एक मेंटर व ट्रेनर की भूमिका में आना चाहिए. इससे पर्यावरण का आचार-व्‍यवहार सतत कारगर हो सकेगा. राजस्थान से अपना वक्‍तव्‍य देते हुए वरिष्‍ठ पत्रकार अमृता मौर्या (संपादक, द डिजर्ट ट्रायल) ने बताया कि मनुष्य और जीवों के साथ का सामंजस्य लगातार बिगड़ रहा है. बढ़ते शहरीकरण और जनसंख्या का शहरों की ओर बढ़ना, जंगलों का कम होना, कचरा प्रबंधन की लापरवाहियां आज बहुत ही घातक हो रही हैं। पिपलांतरी राजस्थान का उदाहरण देते हुए प्रेरणा हेतु सामुदायिक संसाधन प्रबंधन व बालिका संरक्षण के साथ पारिवारिक सहचर्य व प्रकृति के बचाव को संस्‍कार से जोड़ने जैसा पारिस्थिकीय उपक्रम को साझा किया. वहीं नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर डॉ. संतोष शर्मा ने पर्यावरण के उत्तरदायित्‍व व वैधानिक नीतियों पर भारत व अन्‍य देशों के सापेक्ष अपनी बात रखी. डॉ अमिता ने अनेक उदाहरण देते हुए नदियों पर हो रहे दुष्प्रभाव पर बात रखी, साथ ही पर्यावरण के प्रति युवाओं का योगदान पर राष्ट्रीय सेवा योजना के संयोजक राजेश लहेकपुरे ने युवाओं को प्रकृति प्रेमी बनाने का प्रारूप बताया. डॉ अमित राय ने गांधी व अहिंसात्मक दृष्टि से पर्यावरण संकट के समाधान की प्रविधियों पर प्रकाश डाला. अंतरराष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी के अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. एवं अधिष्‍ठाता डॉ. प्रीति सागर ने देश दुनिया के लिए इस प्रकार के आयोजनों की आवश्‍यकता पर जोर दिया. सभी वक्ताओं को साधुवाद देते हुए अध्यक्षीय टिप्पणी में कवि घनानंद को उद्ग्रत करते हुए पर्यारणीय दृष्टि से कहा- तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ लला, मन लेहु पै देहु छटांक नहीं॥ अपनी बात रखी संगोष्‍ठी का संचालन संदीप कुमार वर्मा तथा सभी सत्रों की रिपोर्ट प्रस्‍तुत करते हुए नरेश कुमार गौतम ने धन्यवाद व आभार ज्ञापन किया।

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