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कोरोना काल में इस बीमारी के खिलाफ मजबूत जंग लड़ रहे है हमारे डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी और नर्स। उन्हें पता है कि ये बीमारी जानलेवा है। इसके बावजूद भी वे अपने फर्ज पर डटे हुए हैं। कोरोना के खिलाफ अपनी जान जोखिम में डालकर मरीजों का उपचार कर रही नर्स इन दिनों बेहद अहम भूमिका निभा रही हैं।

आज पूरा विश्व अंतराष्ट्रीय नर्स दिवस मना रहा हैं। पूरी दुनिया नर्सों के त्याग,समर्पण,निष्ठा और उनके दायित्वों को सलाम पेश कर रहा हैं। अपने घर-परिवार से दूर रहकर निष्ठा और ईमानदारी के साथ काम करने वाली नर्सों का आज दिन है। कुछ नर्स कोरोना से संक्रमित हुई, मौत भी हुई। इसके बावजूद भी हौसला नहीं हारी। किसी भी देश में कोरोना के खिलाफ जंग बिना नर्स के सहयोग से नहीं जीता जा सकता।

आइए जानते हैं नर्स दिवस को मनाए जाने का इतिहास

आज अंतराष्ट्रीय नर्स दिवस दुनिया की महान नर्स फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जन्मदिन के तौर पर मनाया जाता है। आज के ही दिन नर्सिंग के क्षेत्र में अच्छा काम करने वाली नर्सों को फ्लोरेंस नाइटिंगेल से सम्मानित किया जाता हैं।

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फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्म 12 मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस में हुआ था। सबसे पहले उन्होंने ही सेक्युलर नर्सिंग स्कूल की स्थापना थी। उन्होंने क्रीमिया युद्ध में घायल हजारों लोगों की जान बचाई थी। इस युद्ध के बाद फ्लोरेंस के कामों को प्रसिद्व मिली। उनके पिता नहीं चाहते थे कि फ्लोरेंस नर्सिंग पेशा में काम करें, क्योंकि उन दिनों इस पेशे को सही नजर से नहीं देखा जाता था। अपने पिता के खिलाफ जाके फ्लोरेंस 1844 में नर्सिंग पेशे में आई गई।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नाइटिंगेल का एक युवक के साथ प्रेम प्रसंग भी चला था, लेकिन 1849 में उन्होंने उससे शादी करने से इनकार कर दिया और कहा कि उनकी किस्मत में कुछ और ही लिखा है। इसके एक साल बाद ही जब घरवालों को ये अहसास हो गया कि नाइटिंगेल शादी नहीं करेंगी तो हारकर उन्होंने नर्सिंग की ट्रेनिंग लेने के लिए उन्हें जर्मनी जाने की इजाजत दे दी।

उनके कामों को प्रसिद्धि क्रीमिया युद्ध के बाद मिली। जब युद्ध चल रहा था, तब उन्हें 1854 में 38 नर्स सहयोगियों के साथ घायलों के ईलाज के लिए तुर्की भेजा गया था। वहां उन्होंने कई चुनौतीयों का सामना किया था। कैम्प में गंदगी,दुर्गंध,उपकरणों की कमी,पेयजल का अभाव और बेड की अव्यवस्था के वजह से सैनिकों में संक्रमण फैल गया था, जिससे कई सैनिकों की मौत भी हो गई थी। फ्लोरेंस अपने सहयोगियों के साथ मिलकर तमाम अव्यवस्थाओं के बीच सैनिकों की जान बचाई थी।

इसी दौरान उन्हें उत्कृष्ट सेवा कार्यों के लिए ‘द लेडी विद द लैंप’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था। क्योंकि, वो रात में ही हाथ में लैंप लिए घायल मरीजों की देखभाल के लिए चली जाती थी।

अमर उजाला की एक रिपोर्ट के मुताबिक फ्लोरेंस को ब्रिटेन की सरकार ने ‘ऑर्डर ऑफ मेरिट’ के सम्मान से नवाजा गया था। ये सम्मान पाने वाली वो पहली महिला थीं।

गौरतलब है कि हिंदुस्तान अखबार की एक रिपोर्ट के मुताबिक 90 लाख नर्सों की जरूरत होगी दुनिया को अगले दशक में, 10 गुना नर्सें हैं अफ्रीकी देशों की तुलना में अमेरिका में, 59 फीसदी है स्वास्थ्य के क्षेत्र में नर्सों की वैश्विक भागीदारी, 20 फीसदी भारतीय नर्स दूसरे देश में जाती हैं नौकरी करने के लिए।

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