असम, जब भी यह नाम दिमाग में आता हैं तो हमारे मस्तिष्क में एक चित्र बनता है, जिसमें हमें सिर्फ पहाड़ ही पहाड़ और हरियाली ही नज़र आती हैं। इस राज्य को कुदरत ने बेइन्ताह खूबशूरती बक्सी हैं। इस कुदरती मेहरबानी की वजह से विश्वभर से लाखों में लोग यहाँ घूमने आते हैं। प्रकृति को अगर करीब से देखना हैं तो असम से ज्यादा उचित जगह नहीं हैं। वहीं असम, भारत के विविधताओं से भरे प्रदेशों में से एक है। भारत में 60 % से ज्यादा चाय का उत्पादन असम एक मात्र राज्य करता हैं। चाय के बागानों को देखने के लिए भारत के ज्यादातर लोग कभी न कभी असम जरूर आना चाहते हैं और असम की विभिन्न जनजातियों के बारे में जानना भी चाहते है।

यही सब सोच कर 2 वर्ष पहले मैं भी असम आया था और पिछले 2 वर्षों में बहुत कुछ जाना, इस खुबसूरत प्रदेश के बारे में और बहुत प्यार भी मिला। लेकिन आज का असम मेरे दो साल के अनुभव से कुछ ज्यादा ही अलग नज़र आ रहा हैं। आज यह प्रदेश भारी बाढ़ से प्रभावित हैं, असम में अभी तक 60-70 लाख से ज्यादा लोग बाढ़ से प्रभावित हो चुके हैं तथा कोरोना जैसी महामारी से अभी 70 लोगों की मौत हुई हैं पिछले चार महीने में, वहीँ बाढ़ से अभी तक 100 से ज्यादा लोग की मौत हो चुकी पिछले एक महीने के अंदर ही। इस बिगड़ते हालातों के बीच मैं पिछले करीब एक महीने में कई जिलों में गया और आम-जन को सहयोग करने का व्यक्तिगत प्रयास किया हैं, लेकिन अब असम कोरोना जैसी महामारी और बाढ़ जैसी त्रासदी दोनों से एक साथ लड़ रहा हैं, तो बड़े-बड़े सहयोग भी कम पड़ रहे हैं। इस तरह की बाढ़ असम के लिए कोई नई बात नहीं हैं क्यूंकि ब्रहमपुत्र और उसकी सहायक नदियों की वजह से असम में हर साल बाढ़ आती ही हैं और बाढ़ असम के भौगोलिक परिदृश्य से देखे तो लाभकारी भी हैं क्यूँकि बाढ़ की वजह से ही असम की जमींन और ज्यादा उपजाऊ बन पाती हैं और कृषि क्षेत्र में बड़ा फायदा मिलता हैं। लेकिन जब भी भारी बाढ़ आती तब बड़े स्तर पर जन-धन और माल की हानि होती है हैं। इस वर्ष बाढ़ और कोरोना जैसे महामारी दोनों का प्रभाव एक ही समय में हुआ हैं, बाढ़ की वजह से हजारों लोग बेघर हो गये हैं और इस कोरोना काल में सभी रिलीफ कैंप में रहने के लिए मजबूर हैं। पूरे असम में 500 से ज्यादा रिलीफ कैंप बनाये गये हैं जिसमे 30-40 हजार लोग अस्थाई रूप से रह रहे हैं। इस बाढ़ की त्रास्दी से मजबूर लोग रिलीफ कैम्पों में चले तो गये, लेकिन अब कोरोना का खतरा उनको डरा रहा हैं। इस बुरे दौर में असम के मजबूर लोग एक उम्मीद की आस लगाये बैठे हैं कि कोई तो फरिस्ता बन कर आयेगा, उनके लिए इस बुरे दौर में।

इतनी बड़ी समस्या होने कि बावजूद भी आज जब भी कोई राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल देखता हूँ तो कहीं पर भी असम के इतने बड़े स्तर की समस्या को कही जगह नहीं दी जा रहीं। किसी दिन मात्र 4-5 मिनट एक वीडियो दिखा दिया जाता हैं और उनकों लगता हैं उनका दायित्व पूरा हो गया हैं। दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन से लेकर राजस्थान की राजनीती की ख़बरों में उलझा आज का राष्ट्रीय मीडिया कैसे असम को भूल जाता हैं। उनकों लगता हैं शायद उतनी TRP नहीं मिल पायेगी या उनके लिए असम की समस्या उतनी बड़ी नहीं हैं। आजकल जब भी मैं अपने दोस्तों से बात करता हूँ तो लोग पूछते हैं क्या हुआ है असम में, बड़ी हैरानी होती हैं यह सुन कर, क्यूकि पिछले एक महीने से असम इतने बड़े स्तर पर लोग बेघर हो रहे, कई गरीब लोग अपना सब कुछ गवा चुके हैं, और उस सरकारी रिलीफ कैंप में बैठे अपनी उस बिलखती आँखों से घर वापस जाने का सपना देख रहे हैं। मैंने उम्मीद भरी नज़रों को बड़ी करीब से देखा हैं। बिना वजह से परिंदा भी अपना घोसला नहीं छोड़ता हैं, वह तो फिर भी इंसान हैं, जिसने अपने खून-पसीने की कमाई से बनाये घास-पूछ के घर को अपनी आखों के सामने उन लहरों में बहते देखा हैं। फिर भी एक उम्मीद है, कि यह डरवानी लहरे किसी दिन तो जाएगी। इस बाढ़ की त्रासदी में हजारों लोगो के घर पानी में बह गये हैं और भारत के कई आमजन को इस बात की खबर तक नहीं हैं। पता होगा भी कैसे, हम मैं से कोई न तो इस बारे बात करता हैं और न ही हमारा राष्ट्रीय मीडिया इसको लेकर जनता को कुछ बताता हैं। वैसे भी राष्ट्रीय मीडिया को अपनी राजनीती और धर्म जैसे मुद्दों से फुरसत मिलेगी तब बात करेगा। आज का भारत पूर्णतः सोशल मीडिया से जुड़ा हैं और वहीँ से सब कुछ कर देना चाहता हैं, आम जन को जिस वक्त असम को सहयोग करना चाहिए, उस वक्त में हम सभी अपने आप में व्यस्त हैं। हम सभी शायद अपनी मौलिक परम्परा को भूल रहे हैं और सोशल मीडिया से ही समाज सेवा कर देना चाहते हैं। इस बदलते वक्त में इस सोशल मीडिया की दुनिया में हमने बहुत कुछ खो दिया, आज मानवता वीडियो और फोटोज को शेयर करके दिखाई जा रही हैं। सहयोग की भावना धीरे-धीरे खत्म हो रहीं हैं, आने वाला वक्त कुछ अलग ही होने वाला हैं। तय समय रहते हम सभी ने स्थितियों को समझा नहीं तो आने वाला समय कुछ और ही गाथा लिखेगा।

मेरा सभी से निवेदन है कि हम सभी सम्पूर्ण भारत में कोई भी समस्या हो तो एक जुटता दिखाए और सहयोग का भाव हमेशा रखे, अन्यथा यह स्थति आने वाले समय में किसी के साथ भी हो सकती हैं, तब शायद कोई सहयोग की मंशा से आपके द्वार ना आये। मैं उन सभी सस्थाओं और लोगो का आभारी हूँ, जो इस बुरे दौर में असम के साथ खड़े हैं और बाढ़ से प्रभावित जिलों में किसी न किसी भांति अपना सहयोग प्रदान कर रहे हैं। दूसरी और मेरी छोटी सी अपील पर सम्पूर्ण भारत से लगभग 60 से ज्यादा वालंटियर हमारे अंत्योदय फाउंडेशन के साथ जुड़े हैं और अपना सहयोग दे रहे हैं। वहीँ ऊपरी असम के एक युवा संगठन People for People ने मात्र 20 दिन की मेहनत से करीब 18 लाख से ज्यादा की सहयोग राशि जुटाई है,अगर हम सभी कोशिश करे तो किसी ने किसी भांति अपना सहयोग बाढ़ प्रभावित लोग तक पंहुचा सकते हैं। उम्मीद आज भी हैं और आगे भी रहेगी।

(लेख में लेखक के निजी विचार हैं।
लेखक का परिचय
Jagdish Bishnoi
Founder of Antyodaya Foundation for Leadership
Ex. Fellow of ADTP Program of NITI aayog,Assam )

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