प्रतीकात्मक तस्वीर

रजनीश चौरसिया

ए भईया! कानपुर कांड की चर्चा बंद करिए। आठ पुलिसकर्मियों का हत्यारा विकास दूबे मुठभेड़ में मारा गया। क्या बात कर रहे हैं? अभी तो वह कल यानी गुरुवार को महाकाल मंदिर उज्जैन में निहत्था आत्मसमर्पण कर दिया था। उसे रात में यूपी पुलिस काफिला के साथ कानपुर ला रही थी। सुबह कैसे मुठभेड़ हो गया? ऐसा है उसे पुलिस जिस महिंद्रा टीयूवी से ला रही थी। वह रास्ते में रहस्यमय ढंग से पलट गई।

तो वह पुलिस का हथियार छिन लिया। फायरिंग करते हुए भागने लगा। जवाब में पुलिस ने उसका एनकाउंटर कर दिया। अरे भाई ! उसे यूपी पुलिस सफारी से ला रही थी। ये महिंद्रा टीयूवी कहां से आ गया? दूसरी बात उसके हाथ में हथकड़ी और पैर में रॉड था। फिर कैसे हथियार छिन लिया और दौड़कर भागने लगा?अगर उसको पुलिस कस्टडी से भागना ही था। तो वह आत्मसमर्पण क्यो करता ? अच्छा ये बताईए जो गोली पुलिस ने अपनी आत्मरक्षा में चलाई। उसे कहां लगी?

भईया जी! एक सिर में दो गोली पेट-कमर को भेदकर पार हो गई। क्या बात कर रहे हैं ? गोली बुलेटप्रूफ जैकेट को कैसे भेद सकती है?
अरे महाराज! वह बुलेटप्रूफ जैकेट नही पहना था।
सुनिए हम आपसे ई जानना चाहते हैं , उसे एमपी पुलिस जो बुलेट जैकेट पहनाकर यूपी पुलिस को सौपी थी। वह बुलेटप्रूफ जैकेट कहां गया?
भईया ई तो पुलिस वाले ही‌ बता पायेंगे। आप यह खबर जिस खबरिया चैनल पर देखें ,वह पुलिस से यह सवाल नहीं पूछा, विकास दूबे बुलेट-प्रूफ जैकेट कैसे उतार दिया?
अरे भईया! सब खबरिया चैनल खुदे विलाप कर रहे हैं।
हम एमपी से पुलिस काफिले के साथ चल रहे थे। कानपुर सीमा पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अचानक मीडिया वैन को रोककर काफिले को आगे बढ़ा दिए। उनकी ओर आधे घंटे बाद खबर मिली कि मुठभेड़ में विकास दूबे ढेर हो गया। अच्छा ! खबरिया चैनल कारण क्या बता रहे हैं? वहीं जो पुलिस की ओर से विभागीय रिलीज में बताई गई हैं। टीवी पर सड़क किनारे पलटी हुई महिंद्रा टीयूवी, चोटिल सिपाही और लहुलुहान विकास दूबे की मृत शरीर की तस्वीर बहत्तर बेरी दिखा रहे हैं।

हां, समझ गये । वह आमजनता को इससे ज्यादा दिखा भी नहीं पायेंगे । क्योंकि उन्हें तह तक तंत्र पहुंचने ही नहीं देगा। अगर वह सच की तह में जाने की कोशिश करेंगे । उससे पहले ही खादी-खाकी की केमेस्ट्री उन्हें मैनेज कर लेंगी। या फिल्मी अंदाज में सबूत को नेस्तनाबूद कर देंगी।

आप सीधे-सीधे बताईये महाराज, घुमाईये नहीं। अच्छा !
देखिए प्रथमदृष्टया यह एनकाउंटर नहीं, यह एक मनगढ़ंत स्क्रिप्ट है। जिसमें खादी-खाकी का गहरा रहस्य छिपा है। पूरे प्रकरण को पलटने की कोशिश है। मैं नहीं जानता यह कितना सच है ? किसी संलिप्त सत्तासीन सफेदपोश के इशारे पर ही आनन-फानन में खाकी ने ऐसी अनसाईज स्क्रिप्ट रचना की है। जो एनकाउंटर स्क्रिप्ट के खांचे में फिट नहीं बैठ रही है। फौरी एनकाउंटर पर प्रश्नचिन्ह लगा‌‌ रही है।

महाराज! इसका मतलब विपक्षी सही कह रहे हैं यूपी पुलिस गाड़ी पलटकर मौजूदा सरकार को पलटने से बचाई है।

अच्छा, महाराज! ई बताईये इस स्क्रिप्ट के पीछे खादी-खाकी का क्या रहस्य है ? देखिए आप यह तो जानते ही हैं। विकास दूबे खाली-खाकी के गठजोड़ से कुख्यात अपराधी बना। कानपुर में गंवई सियासत की सल्तनत खड़ा किया। जब वह तोते की तरह पिंजरे में कैद हो गया । गद्दार खादी-खाकी धारी में दहशत और शंकाएं स्वाभाविक रूप से बढ़ गई। कहीं अगर विकास दूबे तोते की तरह बोलना शुरु कर दिया। तो सबके सब नंगे हो जाएंगे। बेनकाब होकर सलाखों के पीछे पहुंच जाएंगे। उन्होंने अविलंब अपनी ताकत का इस्तेमाल मनगढ़ंत एनकाउंटर की स्क्रिप्ट रचना में की। नतीजतन दहशतगर्द विकास दूबे का अंत हुआ। इसी के साथ समाज में अनगिनत सवालों का जन्म हुआ। जिसमें से एक सवाल सिस्टम के सामने डटकर खड़ा है। खादी-खाकी संरक्षित जुर्म का खात्मा कब होगा ?

महाराज! अगर विकास दूबे का एनकाउंटर खाकी की स्वार्थपूर्ति है, तो शुटआऊट में शहीद हुए पुलिसकर्मियों का परिवार हत्यारे विकास को ढेर करने वाले पुलिस टीम का स्वागत क्यो कर रहा है? समाज दुर्दांत अपराधी के एनकाउंटर पर जश्न क्यो मना रहा है ?

देखिए! कानपुर का चौबेपुर समाज इसलिए जश्न मना रहा है क्योंकि उसने दहशत में तीन दशक घूट-घूट कर गुजारा है। शहीदों का परिवार इसलिए खुश हैं कि उसे तत्काल न्याय मिल गया। न्याय के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ा।
महाराज! क्या भारत में पुलिस जज की भूमिका में है। बिल्कुल नहीं, यह अपवाद है। भारत लोकतांत्रिक देश है। यहां न्याय, न्यायालय में न्यायाधीश करते हैं। पुलिस का कार्य सिर्फ आरोपी को जज के समक्ष कठघरे में खड़ा करना है। संविधान निर्माताओं के मुताबिक जज की भूमिका में पुलिस लोकतंत्रात्मक भावना के विरुद्ध है। लोकतंत्र में जज के रुप में पुलिस घातक है।
अगर समाज विकास दूबे के नाटकीय एनकाउंटर पर पुलिस को सराहा रहा है । तो यह समाज की विवशता है। देश का दुर्भाग्य है। क्योंकि देश का संविधान लचीला है। न्याय व्यवस्था सुस्त है। कोर्ट फैसला सुनाने में आवश्यकता से अधिक वक्त लेता है। नतीजतन विकास दूबे जैसे कुख्यात अपराधी लचीले संविधान को मरोड़कर जमानत पर खुलेआम घूमते हैं। बेखौफ अपराधिक घटनाओं को अंजाम देते हैं। संगठित अपराध की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। बदमाशों को पनाह देते है। क्षेत्र में हनक से वोटबैंक बनाते हैं। राजनीति दलों को लुभाते है।

फिर, राजनैतिक रसूख की बदौलत सांसद-विधायक बन जाते हैं अर्थात् अपराधी से माननीय बन जाते हैं। कुछ शातिर अपराधी सलाखों के पीछे से ही यह मुकाम हासिल कर लेते हैं। अच्छा ! ओह असल बात ई है।
यही लिए टीवी पर सब चीख-चीख कर एनकाउंटर के पक्ष में दलील दे रहे हैं। सिस्टम शहाबुद्दीन, मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद बृजेश सिंह जैसे अपराधियों को पालकर कितने राज का पर्दाफाश किया ? बल्कि अपराधियों को माननीय बना दिया।

भईया! हमहू उन लोगों की दलील से सहमत है। निःसंदेह विकास दूबे जैसे हैवानों का अंत ऐसे होना चाहिए। ऐसे दुर्दांत फुंसी को नासूर बनने में देर नहीं लगता है। अगर न्यायपालिका ऐसे दुर्दांत को विधिसम्मत सजा देने में शीघ्रता दिखाएं तो लोकतंत्र के लिए श्रेयष्कर होगा। महाराज! क्या विकास दूबे माननीय बनना चाहता था?

हां भईया! यही महत्वाकांक्षा ने उसके पाप का घड़ा भर दी। वह अपने साम्राज्य का दायरा बढ़ाने की चाहत में मुकम्मल साम्राज्य को मिट्टी मिला बैठा। दरअसल विकास दूबे का बालू खनन मसले पर क्षेत्रीय विधायक से ठन गई। विधायक के दबाव में खाकी दो गुटों में बंट गई। हिस्ट्रीशीटर विकास के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर कानपुर के सीओ देवेंद्र मिश्र व चौबेपुर थानाध्यक्ष विनय तिवारी में मतभेद गहरा गई। सीओ मिश्र विकास को सलाखों के पीछे ढकेलना चाहते थे। वहीं थानेदार तिवारी विकास के ऊपर लगे संगीन धाराओं को कमजोर करना चाहते थे। इसी मतभेद के धरातल पर विनय तिवारी गुट अपने आठ साथियों का जानी दुश्मन बन गया। गैंगस्टर विकास को पुलिस रेड की सूचना देकर अपने महकमा से गद्दारी कर बैठा। गद्दारों ने वफादारी की शपथ के साथ जिस खाकी वर्दी को पहना था। उसी खाकी वर्दी पर अमिट दाग़ लगा दिया।

गौरतलब हो कि सीओ देवेंद्र वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को पत्र लिखकर गैंगस्टर विकास दूबे के खिलाफ कार्रवाई में थानेदार तिवारी की भूमिका को संदिग्ध बताएं थे। मगर विकास के रसूख को देखते हुए किसी ने कार्रवाई की जहमत नहीं उठाई। इसके बाद से ही विकास दूबे की खुशामद करने वाले थानेदार विनय तिवारी सीओ देवेंद्र से चिढ़ने लगा। नतीजतन सीओ देवेंद्र को आठ साथियों के साथ शहादत देनी पड़ी। दरअसल शुटआउट से एनकाउंटर तक पुलिस की भूमिका संदेहास्पद है।

गैंगस्टर विकास दूबे को सलाखों के पीछे करने में नाकाम कानपुर पुलिस अपने जाबांज जवानों खोने के बाद विकास के महलनुमा घर को फिल्मी अंदाज में नेस्तनाबूद कर दिया। मीडिया ने पुलिस की अप्रत्याशित कार्रवाई को चैनल पर खुन्नस के बुल्डोजर के तौर पर दिखाया। नज़ीर बताया । हमने फिल्मी अंदाज में पुलिस की कार्रवाई पहली मर्तबा देखी। सच तो यह है कि महकमा ने मकान को तहन-नहस नहीं किया है ।बल्कि ठोस साक्ष्य को मिटाया है। महकमा ने मकान पर चालाकी से बुल्डोजर चलाया।। ताकि खाकी से जुड़ा कोई ठोस साक्ष्य सामने न जाएं।

महकमा को मकान पर बुलडोजर चलाने की बजाय उक्त मकान का राजकीय उपयोग करना चाहिए था। जो असल में नज़ीर बनता ।
अच्छा! महाराज खाकी विकास दूबे की खुशामद क्यो करती थी? देखिए! क्षेत्रीय हनक के चलते लगभग सभी राजनीतिक दलों में विकास दूबे का नेटवर्क स्ट्रांग था। वह बसपा सुप्रीमो मायावती से सीधे मुलाकात करता था। इसी से उसके रसूख का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह सत्य है कि दूबे का अपराधिक विकास बसपा शासनकाल में सबसे ज्यादा हुआ। सत्ता किसी का हो विकास का रसूख बराबर था। वह बंदूक की नोक पर गंवई सियासत का बादशाह था। जो उसके राह का रोड़ा बनता था। वह रास्ते से हटाने में देर नहीं करता था।

उसने 2001 में श्रम बोर्ड के उपाध्यक्ष दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की हत्या दिनदहाड़े चौबेपुर थाने में घुसकर की थी। विकास की क्षेत्रीय हनक से सहमे पुलिसकर्मी गवाही से मुकर गये। वह अदालत से बरी हो गया। उस वक्त से चौबेपुर थाने की पुलिस विकास दूबे की खुशामद करती थी। उसके अपराधिक विकास में बढ़-चढ़ कर साथ देती थी।

महाराज! समाज के मुठ्ठीभर लोग विकास के एनकाउंटर पर आंसू क्यो बहा रहे हैं ?
भईया ई मूर्ख लोग जातिगत भावना में जकड़े है। उन्हें पता ही नहीं है। विकास ब्रह्ममण नहीं अपराधी जाती का था। उसने सर्वाधिक हत्याएं ब्रह्मणों की थी। ऐसे ही मूर्ख लोगो की जातिगत सहानुभूति समाज में संगठित अपराध की पृष्ठभूमि तैयार करती है।

महाराज! ई विकास दूबे यूपी से एमपी कैसे पहुंच गया कुछो पता है ?

हां, देखो भईया यूपी टू एमपी की पटकथा खादी-खाकी-कालेकोट की तिकड़म से लिखा गया है।कानपुर से उज्जैन का रोडमैप रसूखदार मंत्री के हाथ, कारोबारी के साथ व वकील के दिमाग से खींचा गया है।

जिसके जरिये गुनाहगार विकास दूबे महाकाल मंदिर पहुंचा। स्क्रिप्ट के मुताबिक खुद को पुलिस को सौंपा।
इसमें खाकी का क्या तिकड़म है महाराज ?
देखिए! सितारेदार खाकी की मिलीभगत से ही विकास दूबे पुलिस की अभेद किलेबंदी को भेदने में कामयाब हुआ।
खाकी पर संदेह तब गहराया। जब विकास दूबे सरेंडर कर दिया। तब पांच लाख इनामी कुख्यात अपराधी की गर्दन पर पुलिस का हाथ पहुंच गया। परंतु मददगार सफेदपोश अपराधी के गर्दन पर नहीं पहुंचा। क्योंकि खाकी ने कोशिश नहीं की। गिरफ्तारी के बाद खाकी विकास दूबे से वही कबूलवाती है। जो पहले से स्क्रिप्ट में लिखा गया था। स्क्रिप्ट में क्या लिखा था महाराज!
अरे बाबा! वहीं जिन पुलिसकर्मियों पर गाज गिर चुकी है। उन्हीं की अपराधिक रिश्तेदारी को प्रकाश में लाना है। ताकी सितारेदार खाकी का दामन पाक साफ रहे। संरक्षक खादी की सफेदी बरकरार रहे।

महाराज! वह तो साथी मनैजर व वकील का नाम बताया था न!
हां, मगर उसके कंठ में चमकदार खादी और सितारेदार खाकी का नाम अटक ही रहा। एनकाउंटर टीम शामिल एसटीएफ जवान की बातों पर गौर करिए । ऊपरी दबाव में विकास का एनकाउंटर किया गया।
लिहाजा विकास की गिरफ्तारी के बाद खाकी-खादी की बेचैनी स्वाभाविक रुप से बढ़ गई थी। कहीं उप्र शासन की सख्ती पर पिजरें में तोते की तरह कैंद विकास सारे राज उगल न दे ! हड़बड़ाहट में तोते के एनकाउंटर की नाटकीय पटकथा गढ़ी गई। उनकी पटकथा प्रथमदृष्ट्या मनगढ़ंत प्रतीत हुई। मगर पटकथा विकास का अंत करने में सफल है। यह तो वक्त ही बताएगा, पटकथा विकास के अपराधिक चैप्टर “खादी-खाकी की केमेस्ट्री” क्लोज करने में कितना सफल है ?

महाराज! जब विकास का चैप्टर ही क्लोज हो गया, तब विपक्ष की मांग सीबाआई जांच का क्या फायदा ?
फायदा है भई.. सीबीआई एक ऐसी जांच एजेंसी है। जो क्राईम की क्लोज चैप्टर को ओपेन कर देती है। अनसुलझे क्राईम केमेस्ट्री को सुलझा देती है। बड़े-बड़े शार्प अपराधियों को सलाखों के पीछे खड़ा कर देती है। मगर ये कभी-कभी सत्ता का पक्ष लेती है। यही कारण है, विपक्षी सीबीआई को केंद्र सरकार के पिंजरे का तोता कहते हैं।

महाराज! आपको क्या लगता है योगी महाराज कानपुर प्रकरण की जांच सीबीआई सौंपेंगे?
अब देखिए! यह फैसला पूरी तरह से योगी सरकार के पाले में है। क्लोज हो चुके कानपुर के क्राईम चैप्टर को ओपेन करना सीएम योगी के हाथ में है। वह खादी-खाकी की केमेस्ट्री को बेनकाब करेंगे या राजनैतिक दबाव में कथित एनकाउंटर से खुद की पीठ थपथाएंगे। यह सूबे का सियासी पारा तय करेगा।
क्योंकि कानपुर शुटआउट से नाटकीय एनकाउंटर तक का घटनाक्रम बता दिया है। खादी सुविधानुसार खाकी और अपराधी का इस्तेमाल करने में माहिर हैं।

एक बात बल देकर कहना चाहता हूं। राजनैतिक दबाव में तेजतर्रार मुख्यमंत्री योगी को कानपुर प्रकरण में नरम फैसला लेने से पहले समाज की आवाज को जरुर सुनना चाहिए। महाराज जी ! दहशतगर्द विकास का अंत हो गया है। मगर सवाल जीवंत है। आखिर क्या है खादी-खाकी की केमेस्ट्री? जिसकी बदौलत विकास दूबे अपराध की इमारत खड़ी की।
अब चलिए ! इस पूरे प्रकरण को सौरभ सुमन की चंद पंक्तियों से समझते हैं।…

आवाज दबा दी गई और साज बच गये
खाकी-खादी के सब राज बच गये।
न जज बैठे, न कोर्ट लगी, सजा मुकर्रर हो गई।
सारे टिड्डे मार दिए, और बाज बच गये।

(लेखक पत्रकारिता के छात्र हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं।)

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