प्रतीकात्मक तस्वीर

राहुल कुमार दोषी

भावनाओं की नींव होता है परिवार! उम्मीदों का बागान होता है परिवार! रूठना, मनाना, दुख-तकलीफ़ को साथ-साथ पचाना, रोटी-सब्जी, दाल-भात और खुशियाँ को बराबर हिस्से में बाँट कर सन्तुष्ट हो जाना तथा घर को संसार मानने की कलाओं से लबालब होता है परिवार! परिवार का होना- मानो अस्तित्व में होना है।

परिवार प्रथम शैक्षणिक संस्थान होता है! अक्षर ज्ञान से लेकर नैतिक मूल्यों को सिखाता है परिवार! अदब क्या क्या है, संस्कार क्या होता है, अनुशासन क्या है, समाज क्या होता है, क्या होता है सभ्य होना, सलीका क्या होता है,और भी बहुत कुछ सिखाता-समझाता है परिवार।

अपनों के लिए झगड़ता है परिवार! अपनों का एहसास कराता है परिवार! परिवार के सभी सदस्यों की अहमियत काफी मौलिक होती है। बच्चे खिलौना होते हैं, युवा खिलौने को चाभी देने वाला, माता-पिता मिठाई लाते हैं और दादा-दादी कहानीकार होते हैं, इस प्रकार परिवार अनवरत कायम रहने वाला प्राकृतिक मेला है। इस मेला में सबकुछ है, हँसी-खुशी, रोना-धोना, आह-वाह, लड़ाई-झगड़ा,बैंड-बाजा-बारात सबकुछ!

परिवार लगाव-मोह-माया की इकाई है। प्रथम स्नेह की उत्पत्ति परिवार से ही होती है। आपकी परवरिश कैसी हुई है यह परिवार से ही तय होता है। मानसिकता,नजरिया, सोच, सहनशीलता और व्यक्तित्व को भी निर्धारित करता है परिवार। परिवार सभ्य मानव सभ्यता की सबसे बड़ी देन है।

परिवार एक ट्रेनिंग सेंटर है,परिवार का सिखाया हुआ ही ताउम्र काम आता है। पद-प्रतिष्ठा और धन-दौलत एक हाथ आता है और दूसरे हाथ से चला जाता है, लेकिन संस्कार और व्यक्तित्व मरने के बाद भी कायम रहता है। इसलिए परिवार का महत्व सबसे ज्यादा है,किताब,शिक्षक और विश्वविद्यालय से भी ज्यादा!

परिवार में खोट भी है, आजकल परिवार का मतलब बच्चा, लड़का, युवा, पुरुष, विधुर और बूढ़े सदस्यों का आँख बंद करके अनुसरण करना हो गया है,बच्ची, लड़की, युवती, महिला, बूढ़ी और विधवा सदस्यों को परम्परा, प्रथा और पुरुष प्रधान मानसिकता की आड़ में किनारे कर दिया जाता है। परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा महिला सदस्यों को प्रताड़ित करना संस्कार देना नहीं है। समकालीन घटनाएं गवाह है कि परिवार में लड़कों को सही मायने में संस्कार की अति आवश्यकता है।

कोरोना काल में परिवार दुःखी है, डरा हुआ है। ऐसे बहुत कम परिवार हैं जिनके सभी सदस्य एक जगह हैं। लाखों परिवार के लाखों सदस्य हजारों किलोमीटर चलकर अपने परिवार के पास पहुँच रहे हैं। मजदूर, विद्यार्थी, मिस्त्री और ठेकेदार परेशान हैं, ये भी किसी ना किसी परिवार के सदस्य हैं, इसलिए फिलहाल तो अधिकतर परिवारों पर संकट है। बुरा दौर से गुजर रहा है परिवार।

दुनियाभर में कोरोना वायरस के 4444537 मामले आ चुके हैं, जिनमें से 302493 लोगों की मौत हो गईं। हमारे देश में कोरोना वायरस के 82 हजार के करीब मामले आ चुके हैं, जिनमें से 2649 लोगों की मौत हो गईं। कहने का तात्पर्य है कि दुनियाभर के लाखों परिवार असहनीय पीड़ा से गुजर रहे हैं। परिवार के एक भी सदस्य की मौत होना – तमाम उम्मीदों, इच्छाओं और ख़्वाबों का अंत हो जाना होता है। इसकी पूर्ति ना तो व्यवस्था कर सकती है और ना ही मुआवजा राशि!

व्यक्ति सबकुछ परिवार के लिए ही करता है ; नाम भले ही गाँव, समाज, जिला, राज्य या देश का होता है। कोरोना काल में प्रत्येक व्यक्ति का बचे रहना ही प्रत्येक परिवार के लिए अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस की शुभकामना होगी।

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