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राहुल कुमार दोषी

जन्म देने, पालने-पोसने,अपने हिस्से की रोटी-तरकारी-भात खिलाने, मेरे लिए औरों से झगड़ने, मेरी पढ़ाई के लिए सूद पर रुपया उठाने, बटाई खेती करने,जल्दी से कुछ बड़ा हासिल करूँ इसके लिए लगातार पूजा-अर्चना,अनुष्ठान, शिव चर्चा करने और कांवरिया बनके सैकड़ों किलोमीटर दूर देवघर जाने के लिए नतमस्तक हूँ मैं माँ।

माँ के बारे में लिखना सूर्य को दीया दिखाने जैसा है। ममता, दया,भावुकता और दुनिया भर की उम्मीदें माँ स्वाभाविक रूप से अपने बच्चों के लिए ताउम्र बरकरार रखती है। जन्म देने से लेकर परवरिश करने तक में माँ सभी दर्द, संघर्ष, संकट और शोषण को सुकून समझती है। दुनिया के सभी रिश्ते माँ के आगे क्षणभंगुर है।

बहुत कठिन है माँ होना; अपने तमाम ख़्वाब को किनारे कर अपने बच्चों के लिए ख़्वाब देखना और लगातार प्रयास करना कि बेटा/बेटी कुछ बन जाए, आसान नहीं होता। माँ के लिए दुनिया की शुरुआत और अंत अपने बच्चों से ही होती है। तप, त्याग और वीरता की प्रतिबिंब होती है माँ। दुनिया के तमाम प्राणियों में माँ की जान बसती है।

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अक्सर बहुत मुश्किल होता है आत्म चेतस से छुटकारा पाना। हम उस दौर में जी रहे हैं जहाँ निज स्वार्थ, निज सफलता, निज संघर्ष, निज पीड़ा, निज लक्ष्य और निज महत्वाकांक्षा सबसे बढ़कर है। इस दौर में माँ और पिता जैसे कुछ रिश्ते ही जीने के लिए टोनिक का कार्य करते हैं। दुनिया के तमाम तर्क और तथ्य माँ के आँचल में गौण नज़र आते हैं।

माँ दुनिया की नींव है और इमारत भी! माँ नैसर्गिक दोस्त है और शिक्षिका भी! माँ कहीं मजदूर है कहीं मजबूर! माँ कहीं प्रधानमंत्री है कहीं चपरासी! गृहिणी, डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर, लेखिका, पत्रकार, किसान, डीएम, अभिनेत्री, मुखिया, विधायक, सांसद, मंत्री और कई अन्य किरदारों में होकर भी माँ तो माँ ही रहती है। बाकी सभी रिश्ते पद और पावर से मजबूत या कमजोर होते होंगे लेकिन माँ और बच्चे का रिश्ता जन्म से लेकर बुढ़ापे तक एक जैसा; माँ-माँ और बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं।

माँ कई बार टूटतीं हैं, कई बार जुड़तीं हैं और कई बार व्याकुल एवं सन्तुष्ट होती हैं। बच्चे का परीक्षाफल खराब आना, नौकरी लगने में देर होना और प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना; माँ के लिए असहनीय पीड़ा है। बच्चे तरक्की करे, रफ़्तार से लक्ष्य की ओर बढ़े और नाम रौशन करे; माँ के लिए इससे बढ़कर खुशी कुछ भी नहीं। कुछ भी हो माँ-बच्चे के बीच दरार कभी नहीं पड़ती, यदि पड़ती भी है तो खोट बच्चे का ही होता है। माँ तो सबकुछ खोकर भी बच्चे को सुखी और खुशी देखना चाहती है।

औलाद कितनी ही दूरी तय कर ले, कितनी ही ऊंचाई प्राप्त कर ले, ज्ञान-विज्ञान और समझदारी से भर जाए लेकिन माँ के आगे रहेगा तो बच्चा ही! वही बच्चा जिसकी नींव स्त्री की कोख रही है। गर्भ में पलने से लेकर समाज/देश/विश्व में लोहा मनवाने तक में बहुमूल्य योगदान माँ की होती है। चोट बच्चे को लगे और दर्द माँ को हो; अजीब कनेक्शन होता है, बहुत अजीब।

मुझे याद है घर का बटवारा हमदोनों भाई के चलते ही हुआ था। औलाद पढ़ लिखकर कुछ बने इसके लिए माँ और पिताजी ज़िद बांध लिए थे। घर के अन्य सदस्य चाहते थे कि मैं और मेरा भाई पढ़ाई छोड़कर खेत में काम करे! लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो माँ और पिताजी का ही हाथ है। पिताजी ने अपने भाई से अलग होना तय कर लिया यानी बटवारा! तब से अब तक अथक त्याग और उम्मीदों के लिए दोनों को शुक्रिया।

पुरुष प्रधान समाज में माँ के लिए भावुकताओं की आड़ में हर रोज समझौता परोसा जाता रहा है। घर में भोजन कम है तो माँ भूखी रहेगी, बच्चे असफल हो रहे हैं तो घरवाले माँ को ताना देंगे, बच्चे बिगड़ गए तो मानो माँ की ही गलती है और हाँ बच्चे के लिए फास्टिंग केवल माँ ही क्यों रखे? तमाम तामझाम माँ के लिए शोषण का जरिया है। माँ का मुक्त होना परिवार और समाज के लिए अतिआवश्यक है।

गौरतलब है कि सबसे अधिक गालियां माँ को संबोधित करके ही दी जाती है, सबसे ज्यादा प्रताड़ित माँ ही होती है, किसी माँ को ही डायन मानकर मार दिया जाता है, तमाम प्रथाओं, परम्पराओं और गंदी मानसिकता का शिकार माँ ही होती है। किसी लड़की/स्त्री के के साथ परजीवी व्यवहार- माँ के साथ धोखा है क्योंकि माँ भी कभी लड़की/बच्ची थी।

माँ मुक्त हो- प्रथा, परम्परा और पुरुषप्रधान जंजीरों से; इससे बढ़कर मातृ दिवस क्या हो सकता है? उस दिन का इंतज़ार है, तब तक के लिए मातृ दिवस की शुभकामनाएं! माँ है तो मैं हूँ, आप हैं और यह दुनिया है।

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