राहुल कुमार दोषी

हम वैज्ञानिक-इंजीनियर-गणितज्ञ तो पैदा करते हैं लेकिन उन्हें संभाल नहीं पाते हैं! गोला, बारूद, हेलीकॉप्टर, राफेल, बन्दूक और यहाँ तक कि छोटे-मोटे मशीन/उपकरण हमें आयात करने पड़ते हैं। एक भारतीय होने के नाते मुझे राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस पर शर्म आ रही है और आपको?

हमारे यहाँ मौलिक मस्तिष्क की कोई कमी नहीं रही है। कमी रही है तो केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की। हमारा सिस्टम/तंत्र कुबुद्धि से युक्त है तब बुद्धि से युक्त माहौल किसे पसंद हो? तर्क करना किसे पसंद हो? शोध किसे पसंद हो? कुछ नया बनाना और कुछ नया करना किसे पसंद हो? इसलिए भारत की तमाम प्रतिभाएं/टैलेंट पलायन कर जाते हैं। जो पलायन नहीं कर पाते वह दम तोड़ देते हैं। यह कटु सच्चाई है, स्वीकार तो करना ही होगा।

बिहार के गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह को कौन नहीं जानता है! दशकों से मानसिक बीमारी से जूझते रहे लेकिन ना तो राज्य सरकार और ना ही केंद्र सरकार ने मदद पहुंचाई। अंत में 2019 में इन्होंने आख़िरी साँस ली। पटना साइंस कॉलेज के छात्र रहे वशिष्ठ नारायण सिंह कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की, वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर रहे और नासा में काम किया। बाद में आईआईटी कानपुर, आईआईटी बम्बई और आईआईटी कोलकाता में भी नौकरी की। इतना ही नहीं, आइंस्टीन को चुनौती भी दे रखे थे। इतने बड़े टैलेंट की कद्र सरकार ने नहीं की। अंत में घड़ियाली आंसू बहाने आ गए। हद है!

बीबीसी हिन्दी से बात करते हुए वशिष्ठ नारायण सिंह की भाभी प्रभावती कहती हैं, “हिंदुस्तान में मिनिस्टर का कुत्ता बीमार पड़ जाए तो डॉक्टरों की लाइन लग जाती है। लेकिन अब हमें इनके इलाज की नहीं किताबों की चिंता है। बाक़ी तो यह पागल ख़ुद नहीं बने, समाज ने इन्हें पागल बना दिया।”

भारत में ऐसे अनेकों वशिष्ट नारायण थे, हैं और रहेंगे, जिन्हें सरकार कुछ समझती ही नहीं है। तंत्र को एक ही बात समझ में आती है- राम नाम जपना पराया माल अपना। दरअसल दूर के ढोल सुहाने होते हैं। विदेश से तकनीक मंगवाएँगे, प्रौद्योगिकी मंगवाएँगे और तो और शिक्षा, नवाचार और शोध में बजट भी कम करते चले जाएंगे। इस स्थिति में तो बाबा जी का ठुल्लू ही मिलेगा; टैलेंट तो अमेरिका, रूस, यूरोप और जापान जैसे देशों में शिफ़्ट होगा ही। भारत अगर तकनीक और प्रौद्योगिकी के मामले में पिछड़ रहा है तो सरकार और व्यवस्था ही इसके लिए जिम्मेवार है।

सरकारी स्कूली शिक्षा का स्तर देख लीजिए, सरकार से घृणा होने लगेगी; वही घिसा-पिटा पाठ्यक्रम, टूटे-फूटे कमरे, कुपोषण को बढ़ावा देने वाला मध्याहन भोजन, अंगूठा छाप शिक्षक यानी निरुद्देश्य से युक्त है शिक्षा व्यवस्था। चीटिंग करके पास होना अब स्किल हो गई है और जुगाड़ से डिग्री लेना योग्यता! जिस देश में मंत्री के ऊपर फर्जी डिग्री का आरोप सच साबित हो जाए वहाँ टैलेंट या तो पलायन करता है या फिर दम तोड़ देता है। इस स्थिति में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस सिर्फ एक दिखावा है। हम कब तक केवल अतीत पर गर्व करेंगे?

आपको जानकर शर्मिंदगी महसूस होगी कि 2019 के IMD वर्ल्ड टैलेंट रैंकिंग में भारत 59 वें स्थान पर है, वो भी 63 देशों की सूची में! यानी नीचे से पाँचवे स्थान पर हैं। अब बोलिए, सरकारें क्यों ना हो बड़ाई की पात्र? यही तो है अच्छे दिन! यही तो है स्किल डेवलपमेंट! यही तो है मेक इन इंडिया! यही तो है राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस की उपलब्धि। हम क्यों ना करें पुष्पक विमान और गणेशजी की शल्य चिकित्सा विज्ञान की चर्चा? इसी से तो हम बना पाएंगे राफेल, बसा पाएंगे मंगल ग्रह पर भारतीय को, उपलब्ध करा पाएंगे वेंटीलेटर्स और जाँच किट्स तथा बना पाएंगे कोरोना का वैक्सीन; है कि नहीं?

गौरतलब है कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा हथियार आयातक देश है। अपनी रक्षा जरूरतों के लिए हम दुनिया के दूसरे देशों पर निर्भर हैं। रूस, इजरायल, अमेरिका और कई यूरोपीय देशों पर हमारी निर्भरता बताती है कि हम कितने प्रौद्योगिकी सम्पन्न हो पाए हैं। हथियारों के आयात में हमारी वैश्विक स्तर पर हिस्सेदारी 12 फीसद है। सच पूछिए तो, मेक इन इंडिया केवल जुमला बन कर गया है। राष्ट्रवाद और देशभक्ति बोलने की चीज़ नहीं है, जीने की चीज़ है; सरकार देश को तकनीक और प्रौद्योगिकी से आत्मनिर्भर करे और जनता नवाचारों से युक्त हो, इससे बढ़कर राष्ट्रवाद और देशभक्ति क्या हो सकती है भला!

वर्तमान में कोरोना वायरस के चलते हमारे यहाँ भी लॉकडाउन लगाना पड़ा। हजारों में मौतें हो चुकी है। लॉकडाउन लगाए हुए महीनों से अधिक हो गए हैं। इसके बावजूद हमारी व्यवस्था वेंटीलेटर्स, मास्क और जाँच किट्स उपलब्ध कराने में नाकामयाब रही है। भारत को चीन से जाँच किट्स आयात करना पड़ा, ताज़्जुब की बात यह है कि अधिकतर जाँच किट्स नकली निकली। ये हाल है हमारा। हमारी औक़ात यही है। प्रौद्योगिकी और तकनीक के मामले में हम यहाँ खड़े हैं।

गूगल, व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टा, ट्विटर, टिकटोक और यूट्यूब सबसे अधिक यूज करेगा भारत और इसे लीड करेगा कोई और देश। मज़े की बात यह है कि तमाम कम्पनियों में भारत की प्रतिभाएं भरी हुई हैं। यानी दिमाग़ भारत का, मेहनत भारत की और सबसे अधिक उपयोगकर्ता भी भारतीय लेकिन नाम किसी और का! यह केवल और केवल भारत सरकार की नाकामी है बस; भारत सरकार राष्ट्रवाद तो जानती है लेकिन राष्ट्र हित में पैकेज देना नहीं जानती। राष्ट्रवादियों, मुबारक हो राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस।

अंत में जानकारी के लिए बता दूँ कि आज के ही दिन 1998 में भारत एक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित हुआ था। दरअसल 11 मई 1998 को पोखरण में तीन सफल परमाणु परीक्षणों के साथ भारत एक परमाणु राज्य बना। इसलिए इस दिन, हम हमारे वैज्ञानिकों और तकनीशियनों के अथक प्रयासों को सलाम करते हैं। काश यह सलामी लफ़्फ़ाज़ी या जुमलेबाजी से हटकर ज़मीनी स्तर पर हो रही होती तो, यकीन मानिए भारत विश्व गुरु बन गया होता!

अटल जी के नेतृत्व और कलाम जी के समर्पण को सलाम! अटल जी के शब्दों को परिमार्जित करके कहें तो, वर्तमान सरकार को प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी राजधर्म का पालन करना होगा।

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