रविवार को आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा ऑनलाइन ‘शंकर व्याख्यानमाला’ का आयोजन किया गया। इस व्याख्यान में चिन्मय मिशन चेन्नई के आचार्य ‘स्वामी मित्रानंद सरस्वती ने कोविड काल की चुनैतियाँ और एकात्मबोध विषय पर प्रबोधन दिया।

स्वामीजी ने कहा कि भारत का विचार वसुधैव कुटुम्बकम का रहा है। हम सम्पूर्ण सृष्टि को ईश्वरमय मानते हैं। स्वामी जी ने आचार्य शंकर के जीवनकाल का एक रोचक उदाहरण दिया। आचार्य शंकर अपनी यात्रा के दौरान हस्तामलक नाम का बालक मिला जिसको लोग मानसिक रूप से निष्क्रिय समझते थे। शंकर ने प्रश्न पूछा तुम कौन हो? तब उसने जो उत्तर दिया वह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। अभी तक हस्तामलक अज्ञानता का अभिनय कर रहे थे। उन्होंने कहा मैं ब्रह्मरूप चेतना हूँ। यह भाव होगा तभी एकात्मबोध संभव होगा। यही हस्तामलक आचार्य के चार शिष्यों में से एक बने।

साथ आना,साथ रहना,साथ उन्नति करना ही यज्ञ है। गीता में बताए गए कर्मयोग में भगवान कृष्ण ने कहा है कि सृष्टि यज्ञ से बनी है। यज्ञ वह है जो हमें जोड़े, हमें एक करे। एकता में ही शक्ति है। सभी मिलकर यज्ञ में योगदान देते हैं, प्रसाद सबको बराबर वितरित होता है।

संयुक्त परिवार की महत्ता

संयुक्त परिवार के महत्त्व को रेखांकित करते हुए स्वामीजी ने कहा कि ऐसे संकेत के समय में व्यक्ति की सामाजिक सुरक्षा व व्यक्तिगत आत्मविश्वास को बढ़ाने में संयुक्त परिवार अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। ऐसे परिवारों में डिप्रेशन इत्यादि नहीं देखे जाते।

कोविड ने बहुत कुछ दिया है, बहुत कुछ सिखाया है

कोविड काल के सकारात्मक पहुलओं पर प्रकाश डालते हुए स्वामीजी ने बताया कि इस संकट की घड़ी में लोग साथ आ रहे हैं – ग्रीनहाउस, प्लास्टिक, कोरोना आदि के दुष्प्रभाव मानव जाति को एक कर रहे हैं। दूसरा सकारात्मक पक्ष प्रकृति की शुद्धि है।

मानव जीवन मानव विचार पर निर्भर करता है
स्वामीजी ने कहा कि हमारा संयुक्त विचार कल्याणकारी हो।
हमारा विचार ही हमारा कर्म बनता है तथा हमारा संयुक्त विचार, और चिंतन विश्व को बदल देगा।

निष्काम प्रार्थना करें

अपने लिए प्रार्थना करने के साथ-साथ निःस्वार्थ प्रार्थना भी करें – पृथ्वी के लिए, पर्यावरण के लिए, मानव कल्याण के लिए।

इस महामारी में हमने त्याग के कई उदाहरण देखे। आज मानव को त्याग सीखने की आवश्यकता है। बड़े उद्देश्य के लिए, श्रेष्ठ के लिए छोटे स्वार्थ को छोड़ना ही त्याग है।

स्वामीजी ने कहा कि आत्मनिर्भर भारत के लिए आत्म-संयम , आत्मानुशासन आवश्यक है।

विश्व ईश्वर की रचना नहीं, ईश्वर की अभिव्यक्ति है। स्वर्ण के आभूषण भिन्न होते हुए भी तत्त्व एक ही होता है, उसी प्रकार हम सब में एक ही आत्मतत्त्व विद्यमान है। यही जानना एकात्मबोध है।

क्या कोविडकाल में हम भौतिकवाद से आध्यात्म की ओर जा रहे हैं?

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए स्वामीजी ने कहा कि न ही हैम भौतिकवाद को छोड़ आध्यात्म की ओर जा रहे हैं, न ही जाना चाहिए। भौतिक सत्ता उपयोग के ही लिए है। परा-अपरा दोनों प्रकार की विद्याएँ हमें सिखाई जाती हैं, एक आत्मज्ञान के लिए, दूसरी इहलोक के भौतिक विज्ञान के लिए। चार आश्रम भी इसीलिए हैं ताकि सही समय पर हम भौतिक जीवन के कर्त्तव्यों को पूरा करें व उसके बाद वानप्रस्थ और सन्यास की ओर जाएँ।
स्वामीजी ने कहा कि इसीलिए पाठ्यक्रम में ब्रह्मविद्या पढ़ाया जाना भी आवश्यक है।

इस व्याख्यान का लाइव प्रसारण यूट्यूब, फेसबुक व ट्विटर पर हुआ। वीडियो लिंक – https://youtu.be/1u0VV4wJ-xs

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