डा कृष्ण गोपाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल ने सोमवार को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अवध प्रान्त द्वारा आयोजित फ़ेसबुक लाइव श्रृंखला में “भारतीय संत परंपरा एवं राष्ट्रीयता के विविध आयाम” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि भारत विश्व भर में अनेकता में विशेषता रखने वाला एक विशेष देश है, हमारी विशेषता हमको दुनिया के और देशों से थोड़ा भिन्न रखती है। हमारी विशेषताओं में हमारी आध्यात्मिक धारा प्रमुख है। दुनिया के अन्य देश राजनीतिक दृष्टि से राज्य व्यवस्थाओं को प्रमुख मानते हुए आगे बढ़ते हैं और उनकी आत्मा राज्यों की व्यवस्थाओं में निहित है। इसके विपरीत हमारे देश की आत्मा अध्यात्म में संचित है, भारत की आध्यात्मिक भावनाओं ने देश को सदैव जीवंत रखा है, और यह धार्मिक भावना सनातन काल से ही वैदिक परंपरा के रूप में पहले और बाद में अनेक धाराओं के रूप में निरंतरता के साथ चली आ रही है। आध्यात्मिक धारा समयानुसार अपना-अपना रूप लेती है कोई भी व्यवस्था कितनी भी अच्छी क्यों न हो वह व्यवस्था समयनुसार बदल जाती है। समाज में विकृतियां आज का स्वाभाविक धर्म है और जब भी विकृतिया आती हैं तो भारत की परंपरा के अनुसार कोई न कोई आध्यात्मिक विभूति देश में खड़ी होती है और समाज को आध्यात्मिक प्रकाश में एक योग्य दिशा देती है। जिससे समाज को एक नया कलेवर मिलता है लेकिन उसकी अंतरात्मा अध्यात्मिक ही रहती है। सनातन संस्कृति कहीं ना कहीं विकृति की ओर चल पड़ी, श्लोकों व कर्मकांड के लंबे होते स्वरूप से उनके अर्थ को समझना मुश्किल हो गया जिससे समाज में दूरियां व मतभेद खड़े होने लगे। ऐसे कठिन काल में स्वयं भगवान बुध अवतरित हुए भगवान बुध करुणा के अवतार थे, दया के अवतार थे एवं साक्षात अहिंसा के प्रतीक थे उन्होंने समस्त देश में विकृतियां और कुरीतियों को दूर कर एक नए समाज की रचना का आह्वान किया। विश्व में संगठित संघ वध एक नया सम्प्रदाय चल पड़ा जिसके अंदर का जो मौलिक तत्व ज्ञान था, दर्शन था व आध्यात्मिक थाउन्होंने विश्व के के किसी भी प्राणी के साथ भेदभाव मानने से अस्वीकार कर दिया। बुद्ध की करुणा बुध की अहिंसा बुद्ध का त्याग और अपरिग्रह आज भी हमारे आंखों के सामने और विश्व के सामने एक आदर्श के रूप में हम देखते हैं फिर एक ऐसा काल आया जिसमें विकृतियां बढ़ गयी फिर ऐसा लगने लगा कि एक नया परिवर्तन होना चाहिए। भगवान बुद्ध का दिया गया विचार भी भिन्न-भिन्न अनेक संप्रदायों, मतों व पंथों में बढ़ता चला गया जब विकृतिया अधिक बढ़ी तो केरल से एक युवक खड़ा होता है। सनातन दर्शन का एक ध्वज पताका लेकर केरल से केदारनाथ तक वहां से कन्याकुमारी तक, वहां से कामाख्या जगन्नाथ जी, द्वारिका होता हुआ कांची काम कोटि आ जाता है। आज से लगभग सवा दो हजार वर्ष पूर्व वह शंकर देश में वैदिक संस्कृति का वैदिक परंपरा का शंखनाद करते हुए चलता है वह सभी के साथ शास्त्रार्थ भी करते है विचार भी करते है फिर से सनातन आध्यात्मिक परंपरा की स्थापना करता है उस समय लगभग 73 प्रकार के पूजा पद्धतियां विकसित हुई थी उन पूजा पद्धतियों का बहिष्कार करते है और केवल पांच प्रकार की पूजा पद्धतियों में सबको समेट देते है। सूर्य है, विष्णु है, शिव है, शक्ति है, और गणेश यह पंचायत्री पूजा का एक नया विचार देते हुए सारे देश को एक नया सांस्कृतिक एकता का दर्शन देते हैं। यह कोई आसान बात नहीं थी शंकराचार्य ने काशी की एक गली में चांडाल को अपना गुरु मान लिया उनको संकोच नहीं हुआ। इस प्रकार ने शंकराचार्य ने एक तरफ आध्यात्मिक जो परंपरा थी जो वैदिक संस्कृति और वैदिक दर्शन था उसको पुनर्स्थापित भी किया और उस समय आगे विकृतियों को दूर करने का एक यशस्वी कार्य किया सारे देश को एक मौलिक एकता का एक नया आयाम उन्होंने दिया। शंकराचार्य ने प्रस्थत्रयी लिखा अर्थात उपनिषदों का ब्रह्म सूत्र का तथा गीता का उन्होंने भाष्य लिखा और इन तीनों ग्रंथों का भाष्य आचार्यों के लिए इस देश में एक प्रकार से अनिवार्य हो गया। आचार्य वही होता था जो इस प्रस्थान त्रई अर्थात इन तीनों ग्रंथों पर अपना भाष्य लिखता था। शंकराचार्य चले गए बाद में समाज में फिर विकृतिया आयी, समाज के ऊपर विदेशी आक्रमणकारियों का आतंक जैसा स्थापित होने लगा उस समय नाथ योगियों को हम लोग देखते हैं। नाथ योगी पिछले 11 सौ 12 सौ वर्षों से देश भर में अलख जगाए हुए थे। गोरखनाथ बहुत महिमामंडित ऐसे योगी हो गए जो पूरे देश भर में नाथ के इस योग्य संप्रदाय का भारी व्यापक विस्तार किया। देश में कोई भी हिस्सा मिलना आज कठिन है जहां नाथ योगी ना हो, इस्लाम के इस आक्रमण के समय इन नाथ योगियों ने गांव-गांव गली-गली जाकर भैरवी गाते हुए मोर्चा लिया। गांव- गांव को एक अच्छा उन्होंने मंच दिया, एक स्थान दिया और इसी समय हम देखते हैं कि दक्षिणी भारत में नयनमार और अलवार संतो की एक सुंदर परंपरा हमको दिखाई देती है। शैव संतो में 63 जो है वो नयनमार है व 12 जो है अलवार है। अलवार वैष्णव संत हैं नैनमार जो है वे शैव संत हैं इनमें शूद्र भी हैं व इनमें स्त्रियां भी हैं नैनमारो में पुनीत होती अम्बरयार नाम की एक महिला भी है और नंदनार शूद्र है। शिव की भक्ति में वे अपने अपने स्थान पर घूम- घूम कर प्रवचन करते हैं और देखते-देखते पूरे तमिलनाडु से भक्ति की तरंगें उठने लगती हैं शिव भक्ति और वैष्णव भक्ति का एक बड़ा उद्गम केंद्र तमिलनाडु बन गया। उसी समय दक्षिण में एक बड़े महिमामंडित एक दूसरे संत प्रकट होते हैं वह विद्वता में प्रखंड हैं, उनका नाम है रामानुजाचार्य आज से लगभग 1000 वर्ष पूर्व रामानुजाचार्य ने प्रस्थान त्रई लिखा अर्थात उन तीनों ग्रंथों पर भाष्य लिखा। समाज में विकृति तो आ रही थी उस विकृति को दूर करने के लिए उन्होंने यह आह्वान किया कि भक्ति के क्षेत्र में सभी को अनुमति है भक्ति के क्षेत्र में किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार नहीं है। रामानुजाचार्य ने दक्षिण में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात किया। उन्होंने उन दिनों की पूजा पद्धतियों में सभी जातियों को सभी वर्णों को स्वीकार किया सबको कार्य दिया। उन्होंने देश की यात्रा की वहां से पदयात्रा करते हुए मेलु कोर्ट तथा दक्षिण भारत से वह दिल्ली तक आये, कहा जाता है कि मल्लिक काफूर नाम का एक जो सरदार था आक्रमण करते हुए वह दक्षिण में पहुंच गया था वहां से वह कृष्ण की मूर्ति लेकर उत्तर भारत आ गया रामानुजाचार्य उस कृष्ण की मूर्ति को लेने के लिए दिल्ली आ गए दिल्ली से भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति को लेते हुए वे आगे बढ़े। दक्षिण भारत की ओर तब तक उत्तर भारत से ही एक परिवार की लड़की जो थी जो मलिक काफूर के ही परिवार की थी उसका नाम था मिनक्ष्या वह भी उन्हीं के साथ चली गई। रामानुजाचार्य ने वैष्णो भक्ति का सुंदर संदेश दिया, पूजा की सभी पद्धतियों में सभी वर्ण और वर्गों को स्थान दिया। वह स्नान करने के लिए जाते थे तो दो ब्राह्मणों के कंधे पर हाथ रख कर के जाते थे, स्थान करके लौटते थे तो दो शूद्र लोगों के कंधे पर हाथ रख कर के आते थे। उन्होंने कहा कि जन्म से कोई बड़ा नहीं होता अर्थात इस देश में भक्ति आंदोलन के प्रणेता के रूप में हम रामानुजाचार्य जी को आज भी स्मरण करते हैं। उनकी परंपरा में आगे आये रामानंदाचार्य यह दक्षिण भारत के ही थे, इन्होंने काशी को ही अपना केंद्र बनाया। रामानंदाचार्य अपने आप में अनेक सद्गुणों के समुच्य थे रामानंदाचार्य एक और बड़े भारी साधक तपस्वी थे तथा दूसरी ओर बड़े भाई विद्वान भी थे, रामानंदाचार्य पहले ऐसे व्यक्ति हैं पहले एक आध्यात्मिक विभूति हैं जिन्होंने ईश्वर की भक्ति के लिए काव्य लोक भाषा में लिखने आरंभ किए और देश में एक नया संदेश दिया। उसके पूर्व जो ईश्वर भक्ति के काव्य थे वह संपूर्ण उत्तरी भारत में संस्कृत में ही लिखे जाते थे। वह मंदिर में पूजा करने वालों का भी सम्मान करते थे और जो मंदिर नहीं जाते थे निर्गुण भक्ति करते थे उनका भी सम्मान करते थे। उत्तर भारत में निर्गुण और सगुण दोनों प्रकार के भक्ति आंदोलनों का केंद्र बिंदु रामानंदाचार्य बन गए, हमको ज्ञात होगा कि हनुमान जी की व किसी भी देवता की जो आरती हिंदी में लिखी गई वह रामानंदाचार्य जी के द्वारा ही लिखी गई। हम सुनते हैं “आरती की जै हनुमान लला की” यह हिंदी में लिखी गई। उसके पहले के सभी जो स्त्रोत थे वे संस्कृत में हुआ करते थे। रामानंदाचार्य ने कहा कि जाति-पाति का कोई भी विचार आध्यात्मिक साधना में स्वीकार नहीं। जाति पाति नहीं। “हरि को भजे सो हरि का होई, जाति-पाति पूछे नही कोई” यह वाक्य स्वयं रामानंदाचार्य ने दिया।

ईश्वर की भक्ति व अध्यात्मिक साधना के काव्य को लोक भाषा में लाने का कार्य रामानंद जी का है। रामानंद जी की शिष्य परंपरा बड़ी व्यापक थी उन्होंने ब्राह्मणों को भी शिष्य बनाया और जो अप ब्राह्मण थे उन्हें भी बड़ी संख्या में शिष्य बनाया। जो सगुण भक्ति वाले थे वह भी उनके शिष्य बने और जो निर्गुण भक्ति वाले थे वह भी उनके शिष्य बने एक आश्चर्यजनक बात यह थी कि जो अपब्रह्मान थे वे अत्यधिक प्रतिष्ठा पाए। कबीर और रैदास इन्हीं के शिष्य थे एवं धन्ना व पीपा इन्हीं के शिष्य थे, महिलाएं भी इनकी शिष्या बनी। इस्लाम के शासक लोग किसी भी प्रकार से यहां के सारे स्वरूप को बदल देना चाहते थे ऐसा वह पूर्व में कई देशों के साथ कर चुके थे संपूर्ण भारत को इस्लाम में बदल देने के लिए वे कृत संकल्पित थे। एक बड़ा संकट हमारा देश देख रहा था समाज बिखरा हुआ था और राजा लोग युद्ध में हार चुके थे, बड़े-बड़े मंदिर उनकी विशाल मूर्तियां हम लोगों के सामने ही ध्वस्त हो गई। आत्मा कार्यों का एक मुख्य उद्देश्य था कि यहां की राज्य व्यवस्था की मदद लेकर यहां के लोगों को इस्लाम में परिवर्तित कर दिया जाए इस बात के लिए कटिबद्ध थे। हिंदू समाज ने ऐसा आक्रमण पहले कभी देखा नहीं था। एक बार मुसलमान बन जाने के पश्चात उसको कोई भी हिंदू बना नहीं सकता था फिर से हिंदू बनाने वाला वह हिंदू बनने वाला इन दोनों के लिए मृत्युदंड ही एकमात्र विकल्प था कौन करता इसका आयोजन! कौन उन्हें पुनः उनके पूर्वजों के धर्म में ले आता!ऐसी स्थिति में रामानंदचार्य खड़े हो गए रामानंदचार्य ने हिम्मत के साथ कहा जो किसी भी प्रकार से जबरदस्ती मुसलमान बनाए गए हैं जो अनिच्छा से मुसलमान हो गए हैं वह फिर से हिंदू धर्म में वापस आ सकते हैं उन्होंने कहा तुलसी की माला कंठ में धारण करो जिव्हा पर तुलसी रखो चार बूंद गंगाजल की अपने मुंह में डालो ईश्वर का नाम लो आप वैष्णव हो गए आप हिंदू हो गए शुद्धि के लिए इतना पर्याप्त है। रामानंद के बाद जो धार्मिक व आध्यात्मिक साहित्य था वह लोक भाषा में आने लगा सभी जातियों में संत खड़े होने लगे महिलाएं भी इस आंदोलन में आगे आने लगी, निर्गुण और सगुण दोनों का समन्वय हो गया। जो किसी कारण से मुसलमान बना लिए गए उनकी शुद्धि के लिए नई व्यवस्था उन्होंने दे दी, आगे से प्रस्थान त्रई लिखना अनिवार्य नहीं रह गया। कबीरदास, रैदास, धन्ना, पीपा व सुतरी बाई ने प्रस्थान त्रई नहीं लिखा था।

लोक भाषाओं में संतों का साहित्य आने लगा इसके लिए जो सूत्रधार बने, समाज में जिन्होंने नई व्यवस्था दी उनका नाम है रामानंदचार्य, उनके सिर से जू कबीर हो गए उन्होंने कहा यह सच बात है संस्कृत में लिखे गए साहित्य को बहुत कम लोग पढ़ पाते हैं। लोक भाषा में लिखा हुआ साहित्य जो है उसे अधिक लोग पढ़ सकते हैं। कबीरदास कहते हैं संस्कृत एक कुएं के जल की तरह है जिसके लिए डोर चाहिए बाल्टी चाहिए तब जाकर उसका जल उपयोग में आएगा इसके विपरीत भाषा जो है वह नदी के जल के समान है जिसका उपयोग कोई भी कर सकता है। अथार्त धीरे-धीरे पूरे देश में संतों का साहित्य लोक भाषाओं में आने लगा संत परंपरा का जो यह नया रूप है या रामानंदचार्य जी के बाद शुरू होता है। संत परंपरा में ऐसे लोगों को भी सम्मान मिला है जो श्रमजीवी जातियों से आए थे जो कोई ना कोई कारोबार करते थे किसी प्रकार का श्रम करके जीवन यापन करते थे उदाहरण के लिए कबीर है जो वस्त्र बनाते थे कपड़ा बिक्री करते थे कपड़ा बिक्री करते समय वह ध्यान रखते थे कि मेरे राम जी इस वस्त्र को पहनेंगे, संत रैदास जूता बनाते समय यह ध्यान रखते है कि मेरे मुकुंद बिहारी यह जूता पहनेंगे। नामदेव शिल्पी हैं वह दर्जी का काम करते हैं कपड़ा सिलते हैं धन्ना जाट हैं रामानंद के बाद देश में ऐसी परंपरा खड़ी हुई जिसमें श्रमजीवी लोग सामने आए। इन संतों ने उस समय की सारी चुनौतियों को स्वीकार किया, वह कठिन काल था हिंदुओं पर एक तरफ जजिया लगा था, अपने तीर्थ स्थानों पर जाने पर भी टैक्स देना पड़ता था, हिंदुओं के सामानों पर चुंगी डबल थी व हिंदुओं को किसी प्रकार की उत्सव मनाने की मनाही थी। ऐसे कठिन काल में इन संतों ने मंच दिया कबीर ने वाणी दी जो समाज में उपेक्षित हो गए थे उनके लिए कबीर लाठी लेकर खड़े हो गए। कबीर पिछड़ी जातियो का नेतृत्व संभाल लेते हैं व हिम्मत के साथ कहते है,“अरे भाई तुम लोग हमारे साथ भेदभाव क्यों करते हो एक ही मां के पेट में 9 माह तुम 9 माह हम रहे तो तुम कैसे बड़े और हम कैसे छोटे हो गए” हिम्मत के साथ इन संतों ने इस भेदभाव के समक्ष प्रश्न खड़े किए इसके परिणामस्वरूप हजारों लोग इन संतो के साथ खड़े हो गए।

संतों ने इन लोगो को एक मंच दिया है, संतों ने इन मूक लोगों को वाणी दी है, संतों ने समाज के कुचले लोगों का नेतृत्व किया है उनका आत्मविश्वास बढ़ाया है और कहा है कि आप चिंता मत कीजिए प्रभु आपके साथ हैं अब किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। समाज के प्रत्येक वर्ग से ऐसे संत खड़े हो जाते हैं जो आध्यात्मिक भाव को लेकर किसी प्रकार के भेदभाव व विषमता को मानने से इनकार कर देते हैं यह प्रकार का अद्भुत व नया आंदोलन है तुलसीदास काशी में उंस समय खड़े होते हैं जब दिल्ली में इस्लाम की सल्तनत है, आतंक है। तुलसीदास ने साहित्य का लेखन किया तुलसीदास ने रामचरितमानस लोक भाषा में लिखा और लोक भाषा में लिखा आध्यात्मिक साहित्य पूरे देश में लोकप्रिय हो गया तुलसीदास संस्कृत जानते हैं मगर संस्कृत जानते हुए भी वह लोक भाषा में रामचरितमानस लिखते हैं। रामचरितमानस लिखकर छोड़ नहीं देते हैं बल्कि रामचरितमानस लिखकर रामलीला का मंचन करते हैं। रामलीला में राम की सेना एक वानर की सेना है, रावण के साथ 100, 200, 500 लोग रहते हैं राम के साथ भी समाज के प्रत्येक वर्ग से लोग रहते हैं सभी जाति वर्गों को वहां स्थान मिलता है। रामराजा है, राम हमारा आराध्य है, भारत का राजा राम है, हिंदू का राजा राम है और तुलसीदास ने वही नारा लगवाया रामलीला में राजा रामचंद्र की जय, राजा रामचंद्र की जय गांव-गांव गली-गली मुहल्ले में तुलसीदास ने लोगों को प्रशिक्षित करके रामलीला खेलने के लिए भेज दिया यह एक नया जनांदोलन था। तुलसीदास अकबर के दरबार में नहीं थे अकबर के दरबार में एक बार उन्हें बुलायागया मगर तुलसीदास ने उन्हें मना कर दिया तुलसीदास ने राम के दरबार को स्वीकार किया अकबर के दरबार को नही। जो सम्पूर्ण रामचरितमानस नहीं पढ़ सकते हैं उनके लिए तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा लिख दिया तुलसीदास जी ने कहा कि गांव-गांव हनुमान जी की मूर्तियां बनाओ और स्थापित करो और अखाड़े बनाओ स्वस्थ मन स्वस्थ शरीर के साथ हमारे युवक खड़े होंगे। उत्तरी भारत में गांव-गांव के अंदर अखाड़े और मंदिर स्थापित होने लगे।

हम जब पंजाब का संत आंदोलन देखते हैं तो उसमें एक नई बात है पंजाब के संतो का नेतृत्व करते हैं गुरु नानक देवजी किंतु नानक जी से 200 वर्ष पूर्व में ही नामदेव पंजाब में आ गए थे। भक्ति का प्रचार नामदेव पंजाब में करते है इसके पश्चात गुरु नानक देव आते है गुरु नानक देव पंजाब से निकलकर पूरे देश में घूमते है। पंजाब की धरती से निकलकर गुरु नानक देव देश के सारे प्रमुख तीर्थो पर गए। जब वे जग्गनाथ जी के मंदिर में गए तब ध्यान आया की आरती हो रही है तो उन्होंने तो उन्होंने प्रकृति की आरती करने को कहाँ, उन्होंने कहा देखो भगवान ने कैसा गगन बनाया कैसा सूर्य और चंद्र बनाया इसकी पूजा करो भगवान की आरती इस प्रकार से करो उन्होंने कहाँ की उन्होंने कहा कि यह जो यज्ञोपवीत पहन रहे हो एक ऐसा यज्ञों पवित पहनों जिसमें त्याग हो, ज्ञान हो ऐसा करके उन्होंने यज्ञोपवीत का विरोध नहीं किया अपितु यज्ञोपवीत की परिभाषा बदल दी आरती का विरोध नहीं किया अपितु आरती की परिभाषा बदल दी यह नानक का संदेश था नानक का संदेश ऐसा है जो उस युग के अनुकूल है नानक का संदेश नवजागरण का संदेश है समाज में भेदभाव है समाज में ऊंच-नीच है गुरु नानक देव जी ने जो जगह-जगह अपने प्रवचन दिए उसमें सब को एक साथ जोड़ लिया वहां भेदभाव नहीं था सब जाति वर्ग के लोग एक साथ एक स्थान पर आते थे वहां गुरु नानक देव जी के प्रवचन होते थे वहाँ भजन- कीर्तन होते थे वहीं उसी में से धीरे-धीरे गुरुद्वारे खड़े हुए, उसी में से सामूहिक भोजन लंगर की कल्पना फलीभूत हुई। उस संत परंपरा को जब हम आगे दशम गुरु तक आते है तो देखते है परिस्थिति या बिगड़ी हुई है उनके दो गुरुओं का बलिदान हो जाता है गुरु अर्जुन देव जी की हत्या हो चुकी है, गुरु तेग बहादुर का बलिदान दिल्ली में हो जाता है क्योंकि उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया था। एक नई चुनौती गुरु गोविंद सिंह जी के सामने हैं गुरु गोविंद सिंह जी संत हैं वह आध्यात्मिक है किंतु वह आध्यात्मिक होते हुए भी एक सेना सजाते हैं वह खालसा पंथ की स्थापना करते हैं खालसा पंथ का सृजन करते हुए एक नया संस्कार देते हैं और संस्कार देते हुए कहते हैं अब सिंघ हो गए। जिनको घोड़े पर चढ़ने की मनाही थी वे घोड़े पर चढ़ गए, जिनको ऐसा लगता था की शस्त्र नही ले सकते वो शस्त्र लेने लगे, जिनको ऐसा लगता था और कहा जाता था कि पगड़ी नही बांध सकते वे पगड़ी बांधने लगे। जाति का भेद मिट गया सारा समाज संघर्ष करने के लिए खालसे के रूप में खड़ा हो गया लेकिन वे भक्ति की मांग कर रहे थे वे भक्ति का ही संदेश देते थे और कहते थे “यही दास मांगे कृपा सिंधु की जय स्वयं ब्रह्म की भक्ति सर्वत्र दी जय” विभक्ति का आह्वान करते हुए देख रहे थे किसी प्रकार भक्ति को केंद्र बिंदु मानकर भक्ति का भक्ति का जागरण करते हुए खालसा का सृजन किया जाए यह उनका मुख्य उद्देश्य था खालसे में सभी जाति, सभी वर्गो व वर्णो के लोगों को मुख्य स्थान था खालसे सैनिक भी थे खालसे संत भी थे मगर धर्म की रक्षा के लिए थे। वे खालसे की सृजन के साथ ही हिन्दू धर्म के जागरण का प्रयत्न भी कर रहे रहे थे वो सैनिक भी थे संत भी थे वो शस्त्र भी रखते है आध्यात्म का आह्वान भी करते है ऐसी संत परंपरा जो पंजाब में खड़ी हुई उसने व्यापक रूप से संघर्ष किया आध्यात्म का ज्ञान भी दिया व सुरक्षा के लिए भारत की पश्चिमी सीमा पर एक शसस्त्र सैन्य बल खड़ा कर दिया सिख शक्ति के उदय के बाद भारत की पश्चिमी सीमा सदैव के लिए सुरक्षित हो गयी उसके पीछे भारत का यह संत आंदोलन ध्यान में रखना चाहिए।

महाराष्ट्र में एक बड़ा संत आंदोलन खड़ा होता है महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर हैं, महाराष्ट्र में नामदेव हैं, वहां तुकाराम है व समर्थ गुरु रामदास है ऐसी बड़ी भारी परंपरा महाराष्ट्र में संतों की है जो खड़ी है एक के बाद एक एक नया संत वहाँ खड़ा होता युगानुकूल शास्त्रों की व्याख्या करता है युगानुकूल वहाँ संदेश देता है महाराष्ट्र की संत परंपरा जम समर्थ गुरु रामदास को देखते हैं तो समर्थ गुरु रामदास राम की आराधना सिखाते हैं जैसे तुलसीदास जी यहां अखाड़े बनवाते हैं वैसे वहां समर्थ गुरु रामदास अखाड़े बनवाते हैं वहां राम मंदिर-हनुमान मंदिर स्थापित करवाते हैं वहां नौजवानों को आह्वान करते हैं धर्म के लिए बलिदान होने को तैयार हो जाओ मारते-मारते शहीद हो जाओ मगर अपना राज्य स्थापित करो संत होते हुए भी वह राज्य की स्थापना का संदेश देकर आह्वान कर रहे हैं क्या ऐसी परंपरा दुनिया में कहीं मिलेगी समर्थ गुरु रामदास जी के इस आह्वान व तुकाराम जी के सारे अभंगों को सुनकर जो जागरण हुआ वह अद्भुत था। छत्रपति शिवाजी महाराज का हिंदवी साम्राज्य का आह्वान भी उसी में से हुआ। जब हम बंगाल में देखते हैं तो वहां एक नवजागरण चल रहा था एक नौजवान नवलदीप से चला और देश भर की यात्रा करता हुआ वृंदावन आ गया वृंदावन तो लुप्त हो गया था वृंदावन को खोज पाए उसके लिए हरि बोल- हरि बोल का एक कितना छोटा मंत्र देता है।एक बार ऐसा होता है कि हर बोल पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है इसके पश्चात चैतन्य महाप्रभु ने सभी लोगो को इकट्ठा कर ऐसा संकीर्तन किया कि काजी महाशय खुद हरि बोल में सम्मिलित हो गए। हरि बोल- हरि बोल करते हुए वे स्वयं वैष्णव हो गए हमेशा के लिए चैतन्य महाप्रभु के शिष्य हो गए।

आसाम में तो बहुत बड़ा क्षेत्र नदियों पहाड़ों से घिरा हुआ है वैष्णो भक्ति के लिए वहां श्रीमंत शंकरदेव खड़े हो गए उनके शिष्य परंपरा में दामोदर रेव माधव देव थे आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व ब्रह्मपुत्र की उत्पतिकाओ में दूर-दूर नदी नालों से दूर जंगलों से घिरे हुए उस क्षेत्र में वैष्णव भक्ति का प्रचार श्रीमंत शंकरदेव ने किया। शंकर देव जी के इस प्रचार को हम देखते है तो पाते है वहां हजारों नामघर खड़े हो गए वहां पर वैष्णो भक्ति का प्रचार प्रारंभ हो गया घर-घर कृष्ण भक्ति और वैष्णो भक्ति प्रारंभ हो गई। आज हम देखते है की आसाम में कोई भी ऐसा गांव नही मिलेगा जहाँ वैष्णव भक्ति वाला केंद्र नामघर ना हो। उन्नाव घरों ने एक ऐसी अलग जगाई जो दूर दूर खड़ी छोटी-छोटी जातियां सब जातियां वैष्णो भक्ति में विलीन हो गई इतना बड़ा राष्ट्रीय जागरण आसाम में हमारे इन भक्तों ने किया है लेकिन एक ध्यान रखने की बात है यह संत लोग कभी क्षेत्रीय बात को नहीं फैला है शंकर देखने कभी आसाम बात की नहीं कि चैतन्य महाप्रभु ने कभी बंगाल की बात नहीं कि गुरु नानक देव जी ने कभी पंजाब की बात नहीं की जब बाबर का आक्रमण हिंदुस्तान पर हुआ तो गुरु नानक देव जी ने कहाँ की कैसा पाप का आक्रमण बाबर ने हिंदुस्तान पर किया है। ठीक इसी प्रकार से हमारे श्रीमंत शंकरदेव जी कहते हैं कि करोड़ों-करोड़ो जब कर्म फलीभूत होते हैं टैब जाकर भारत भूमि पर जन्म मिलता हैं यहां से सैकड़ों हजारों किलोमीटर दूर आसाम के जंगल से घिरे गाँवो में बसने वाले एक संत यह बात कहते हैं की करोड़ों करोड़ों जन्मों के बाद जब महा पुण्य एकत्रित होते हैं तब जाकर कभी-कभी व्यक्ति का मनुष्य में जन्म होता है उसमें भी भारतवर्ष में जन्म बड़े पुण्य से मिलता है।

इन संतों ने कभी दरबार की भक्ति स्वीकार नहीं की दरबारों में उन दिनों गायक और भाट चारण होते थे। अकबर ने जब कुंदन दास को बुलाया तो कुंदन दास ने पहले मना कर दिया किंतु जब पालकी भेजी तो कुंदन दास उस पालकी के पीछे-पीछे चलते हुए प्रयाग से फतेहपुर सीकरी आ गए अकबर जब कहता है बैठो तो बैठते नहीं हैं अकबर जब कहता है भजन सुनाओ तो भजन भी ऐसा सुनाते है जो कर्ण प्रिय नही हो। “संतन कहाँ सीकरी सो काम, आवत-जात पनहिया टूटी बिसर जात हरि नाम” ये संतो की अद्भुत हिम्मत थी। इसी प्रकार से जब अकबर वृंदावन से हरिदास जी को बुलाता है तो वे नही गए अंततः अकबर ही उन्ही के पास आकर भजन सुनता है। उसके प्रयास के बाद भी हरदास जी कभी नही गए। इन संतो न स्वाभिमान जगाया। संतों ने दरबारी कवि के रूप में वहां स्थान पाने की कभी कोशिश नहीं की संतो ने दरबार को कभी महत्व नहीं दिया उनके लिए ईश्वर का दरबार पर्याप्त था।

कभी-कभी आप लोगो के मन में एक प्रश्न आता होगा कि बाहर से आने वाले ग्रीक, पारसी, हूण भारत की परंपरा में विलीन हो गए किंतु इस्लाम विलीन नहीं हो पाया मगर आध्यात्म यह कार्य कर रहा था। इस्लाम बहुत कठोरता के साथ आया था, इस्लाम ने किसी प्रकार की चर्चा व गोष्ठी को स्वीकार नहीं किया उन्होंने एक बार घोषणा कि, की जो हमारे पुस्तक में है वही पर्याप्त है जो पुस्तक के बाहर है हमें उसकी आवश्यकता नहीं है ऐसी घोषणा के बाद किसी चर्चा का महत्व नहीं रह गया। किंतु इसके पश्चात भी भारत की आध्यात्मिक धारा की सुचिता पवित्रता ऐसी थी कि सब उसमे आनंदित थे। हम देखें हजारों मुसलमान ऐसे थे जो आध्यात्मिक धारा में डूब गए वह आध्यात्मिक धारा के साथ एक रूप होने लगे इस अध्यात्म के साथ उन्हें आनंद आने लगा ईश्वर की भक्ति भक्ति के साथ में समरस होने लगे ऐसे सैकड़ों हजारों मुसलमानों को हम देखते हैं। जिन मुसलमानों ने इस आध्यात्मिक धारा को स्वीकार किया उसमें रसखान है,कारेवेद हैं,शेख मोहम्मद हैं, फरीद है, लाल दास हैं,कमाल साहेब हैं,अली कादर हैं,रहीम साहब समेत इत्यादि बहुत लोग हैं मैं आज आप सब के समक्ष एक छोटा सा उदाहरण रहीम का देता हूं आपने रहीम के बहुत सारे दोहे सुने होंगे रहीम कृष्ण भक्त भी हैं, राम भक्त भी हैं, रहीम गंगा भक्त भी हैं, रहीम शिवभक्त भी हैं बहुत सारे उनके प्रसंग है किंतु आज आपके सामने उनका एक नया स्वरूप दिखाता हूं रहीम भगवान विष्णु से प्रार्थना करते हैं, हे भगवान विष्णु हम आपकी आराधना कैसे करें हम आप को क्या दें हम आपको क्या समर्पित करें आपके पास तो सब कुछ है दो सुंदर ढंग से रहीम ने लिखा है, ” रत्ना करो अस्ति सदनं, गृहणी च पदनाभ किम देय मस्ति भवते जगदीश्वराय:” आपका जो आवास है वो रत्नाकर है और आपकी पत्नी साक्षात लक्ष्मी है फिर मैं क्या दू आपको है जगदीश्वर आपके लिए क्या चीज कम है। “राधा ग्रहीत मनसे.. मनसे चतुभ्यम” मगर प्रभु आपके पास एक चीज़ कम है राधा ने आपके मन को ले लिया है आपका मन राधा के पास है आपके पास मन का आभाव है। रहीम कहते है “दत्तं मया निज मनस्थ हृदम ग्रहान:” अर्थात मैं अपना मन आपको दे सकता हूँ कल्पना कीजिये कैसी भक्ति रहेगी। ये भारतीय संस्कृति के साथ उनका मिलन कितना मनोहर है। हम जानते है कि एक महिला जिनका नाम ताज बीबी है वो मुगलिया सल्तनत की थी कहते है कि अकबर की बेटी या पत्नी थी वो वृंदावन आ गयी और कृष्ण भक्ति में लींन हो गयी कृष्ण भक्ति में रमते हुए ताज बीबी ने कई काव्य लिखे है।

इस प्रकार से हम देखें तो भारत की यह संत परंपरा पिछले युग में अर्थात रामानुजाचार्य से लेकर 18 वीं शताब्दी तक लगभग 700सौ वर्ष तक हम संत परंपरा कहते हैं उसका एक अद्भुत स्वरूप हमको देखने को मिलता है एकओर इस संत परंपरा में सभी प्रांतों के लोग हैं कोई भी प्रान्त छुटा नही है चाहे उत्तर प्रदेश हो, चाहे बिहार हो, चाहे पंजाब हो, चाहे आसाम हो,चाहे बंगाल है, चाहे कर्नाटक है समय अभाव के कारण मैंने आपको उन सभी प्रांतों की बातों को विस्तृत रूप से नहीं बताया किंतु कोई भी प्रांत छूटा नहीं जहां इन संतों का आवीर्यभाव ना हुआ हो, कोई भाषा नहीं छुटी जिन भाषाओं में इन्होंने आध्यात्मिक भक्तों की रचना नही की हो कोई जाति नहीं छूटी जिस जाति वर्ण-वर्ग में सम्मिलित न हुए हो। अतः यह आंदोलन ऐसा है जो सारे देश मे व्याप्त हो गया, तमिलनाडु-कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक चला गया कोई भाषा नहीं छूटी कोई प्रांत नहीं छूटा, आश्चर्य की बात यह थी कि इसमें दूज भी हैं शुद्ध भी हैं, महिलाएं भी हैं कश्मीर की लल्लेश्वरी हैं वो शैय भक्त है, तमिलनाडु की अंडाल हैं वह वैष्णव भक्त हैं, राजस्थान की मीरा कुमारी के काव्य आज तक लोगों को याद है बेनाबाई हैं वह महाराष्ट्र की हैं अक्कमहादेवी हैं जो कर्नाटक की हैं सारे देश की महिलाओं ने इसमें अपनी भूमिका निर्वहन की है एक ओर हर भाषा में दूसरी ओर हर वर्ण में तीसरी और हर जाति में यह आध्यात्मिक आंदोलन समान रूप से संचालित हुआ इसमें सब का सामंजस्य है, सब का समन्वय है यह हमें बस संत आंदोलन में ही देखने को मिलती है मुसलमान भी इसमें सम्मिलित हो रहे हैं यह आश्चर्य की बात है। यह कुरीतियों को मिटाता है भेदभाव को मिटाता है संत लोग देश भर की यात्राएं करते हैं, जो देश में मौलिक एकता लाने की कोशिश करते हैं। शंकराचार्य केरल से उत्तरी भारत तक केदारनाथ से बद्रीनाथ तक चले आते हैं, चैतन्य महाप्रभु बंगाल से निकलते है कन्याकुमारी-रामेश्वरम तक जाते है द्वारका होते हुए वृंदावन आ जाते हैं, गुरु नानक देव पूरे देश में घूम कर आते हैं, शंकर देव जब आसाम से निकलते हैं तो देशभर में घूम कर वापस आसाम आ जाते हैं। इन संतो ने सारे देश को अपना माना है। इस पूरे विश्व मे क्या कोई ऐसा देश है जिसने भूमि के प्रति भक्ति का भाव जगा दिया हो। क्या UK, USA, फ्रांस, जर्मनी व आस्ट्रेलिया वे देश भी अपने देश मे समाज की भावनाओं में भूमि के प्रति भक्ति का भाव नही जगा पाए।

भूमि के प्रति भाव जगाने का कार्य संत परंपरा करती है हर देश को जोड़ने का काम संत परंपरा करती है निर्गुण और सगुण के भेद को मिटाने का कार्य संत परंपरा करती है, ऊंचे व नीचे के भेद को मिटाने का कार्य संत परंपरा करती है, महिला व पुरुष का अंतर नहीं देखती है भारत की संत परंपरा ने समाज को एक अद्भुत आयाम दिया है इन अद्भुत आयामों का यह संदेश है जो भारत का मौलिकता को भी प्रमुख बताती है और देश की आध्यात्मिकता को भी प्रमुख बताती है।

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