यह शीर्षक लिखने में ही मेरा मन टूट सा गया, और इसे पढ़ते वक्त आपकी रूह भी कांप उठी होगी। 14 अगस्त 1947 की वह शाम केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज कोई साधारण तारीख नहीं है, बल्कि यह उस अमानवीय त्रासदी की याद दिलाती है, जिसने एक पूरे उपमहाद्वीप की नियति को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। आजादी की पूर्व संध्या हजारों मासूमों के कत्लेआम का जरिया बनी।
बंटवारे का मूल्य लोगों ने अपने जीवन, अपने घरों, अपनों के साये और अपनी सदियों पुरानी पहचान को गंवाकर चुकाया। रातों-रात करोड़ों लोग अपने ही घर में शरणार्थी बन गए। बचपन के दोस्त, हमसाए और रिश्तेदार, सब एक नवनिर्मित सरहद के कारण एक-दूसरे के लिए अजनबी हो गए। टेंटों में दिन बीते और पटरियों पर रातें कटीं। लोग अपनी भाषा की साझा मिठास, अपनी साझा विरासत और पीढ़ियों पुरानी ‘सांझा संस्कृति’ को खो बैठे।
हमें स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन विभाजन के दंश के साथ। जो अपने थे, पराए हो गए। अपने ही दुश्मन बन बैठे। हमारी गलियां सीमाएं बन गईं। इस त्रासदी में हमारी संस्कृति और सभ्यता ही बिखर गई। हमारे पूर्वजों ने अखंड भारत को टूटते देखा। इस विस्थापन के दौरान हमारी माताओं-बहनों के साथ जो जघन्यतम अपराध हुए, उन्हें याद कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
हमारा पवित्र पंजाब दो टुकड़ों में बंट गया। ननकाना साहिब, पंजा साहिब, कटासराज, हिंगलाज माता मंदिर, शारदा पीठ और तक्षशिला जैसे प्राचीन और पवित्र स्थल पीछे छूट गए। वे पावन स्थान, जहां हमारे पूर्वजों ने साधना की थी, अब एक कृत्रिम रेखा के दूसरी तरफ हैं।
एच.वी. शेषाद्रि जी की पुस्तक ‘और देश बँट गया’ जब भी उठाता हूं, सिहर जाता हूं। पन्ना दर पन्ना, शब्द दर शब्द विभाजन की पीड़ा रिसती है। यह किताब अहसास कराती है कि हम अपनी ही अखंड भूमि को बचा न सके। विभाजन के कारणों पर ऐसी पुस्तक आपको नहीं मिलेगी।
विभाजन का पूरा नुकसान भारत को उठाना पड़ा। पाकिस्तान के रूप में हमारे पड़ोस में एक स्थायी शत्रु बन गया। भारत से विस्थापित होकर पाकिस्तान गए नागरिकों की हालत बद से बदतर रही, वहीं पाकिस्तान तथा बांग्लादेश में रह गए धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ जो अमानवीय ज्यादतियां हुईं, वे किसी से छिपी नहीं हैं और आज भी जारी हैं।
सोचिए, यदि आज अविभाजित भारत होता तो विकसित होने का सपना पूर्ण होने के बहुत करीब होता। काबुल से केरल, लाहौर से लखनऊ, चटगांव से चेन्नई और कराची से काशी तक ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का दिव्य स्वरूप हम सभी के सामने होता। हम दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में से एक होते। कश्मीरी हिंदुओं को अपने ही देश में शरणार्थी न बनना पड़ता। तब सच्चे अर्थों में ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’ का गान संपूर्ण अखंड भूमि पर गूंजता।
कहने को तो बहुत कुछ है, लेकिन आगे बढ़ने का रास्ता प्रेम, सद्भाव और सतर्कता का ही है। गलती की पुनरावृति न हो, इसके प्रति हमें सदैव सतर्क रहना होगा। हमारा यह संकल्प होना चाहिए कि हम अपने पूर्वजों की उस धरती और सांस्कृतिक विरासत को हमेशा याद रखें, और देश को बांटने वाली ताकतों के प्रति हमेशा सजग रहें, ताकि इतिहास खुद को कभी न दोहराए।
आज ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के अवसर पर, मैं उस त्रासदी में अपनी जान गंवाने वाले सभी देशवासियों को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। प्रार्थना है कि दुनिया का कोई भी कोना ऐसी पीड़ा कभी न देखे, और किसी देश के नसीब में भारत जैसा दर्द न आए।
वासुमित्र पांडेय
CEO, लाइटिंग एंड ड्यूरेबल्स, सूर्या रोशनी लिमिटेड



















