भाजपा के लिए सावन का पहला सोमवार शुभ नहीं रहा है। बिहार से लेकर मध्य प्रदेश में हुए उपचुनावों में पार्टी को मुँह की खानी पड़ी। दतिया उपचुनाव में जहां कांग्रेस ने फिर से बाजी मार ली। तो वहीं बिहार के बांकीपुर में पार्टी का 30 साल पुराना दुर्ग ढह गया। प्रशांत किशोर ने यहां भाजपा को करारी शिकस्त दी। आइए समझते हैं कि भाजपा के हारने की वजह क्या रही?
बांकीपुर में पीके का जादू चला
सबसे अधिक निगाह में कहीं टिकी हुई थी तो वह बांकीपुर ही था। भाजपा के नए अध्यक्ष नितिन नवीन की यह सीट थी। पहले उनके पिता फिर वो ख़ुद कई बार से चुनाव जीत चुके थे। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद जब वो राज्यसभा के लिए निर्वाचित हो गए तो उन्होंने इस सीट को छोड़ दिया। जिसके बाद यहां उपचुनाव हुए।
भाजपा ने यहां दूसरी बार में अपना कैंडिडेट फ़ाइनल किया। लेकिन जीत नहीं मिल सकती। प्रशांत किशोर को क़रीब 49 प्रतिशत वोट यहां मिला है। जनसुराज पार्टी के कर्ता-धर्ता प्रशांत किशोर पहली बार विधायक बने हैं।
क्यों हार गई भाजपा
भाजपा ने इस चुनाव को बहुत हल्के में लिया था। कैंडिडेट को लेकर भाजपा के अपने कैडर में कोई चर्चा नहीं थी। पार्टी को लगा परंपरागत सीट है किसी को भी खड़ा करने पर जीत मिल जाएगी। लेकिन प्रशांत किशोर ने सबकुछ बिगाड़ दिया। पीके ने डोर टू डोर कैंपेन किया। बिहार के सीएम पर वो लगातार हमलावर रहे। इन सबके अलावा आरजेडी ने भी अच्छा चुनाव नहीं लड़ा। जिसका फायदा प्रशांत किशोर को मिला।
दूसरी तरफ़ भाजपा ने आखिरी समय में ताक़त झोंक दी थी। लेकिन तब तक बहुत देर हो गई। पार्टी के द्वारा कैंडिडेट बदलने का भी नकारात्मक असर पड़ा है।
दतिया ने फिर नहीं गली भाजपा की दाल
भाजपा को मध्यप्रदेश की दतिया में फिर झटका लगा है। इस पार्टी ने पुराने और क़द्दावर चेहरा नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया था। लेकिन उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस इस बार इस सीट को 6000 से अधिक वोट से जीतने में सफल रही। इससे पहले 2023 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को ही यहां जीत मिली थी।
















