प्रतीकात्मक तस्वीर

अभिषेक पाण्डेय

‘जड़ता है जीवन की पीड़ा
निस-तरंग पाषाणी क्रीड़ा’

जड़ता में स्थिरता है, चैतन्य उसका विरोधी गुण है जो जड़ता के प्रति विद्रोह है। जड़ता में जकड़न है, बंधन है। चेतना उस जकड़न से, उस बंधन से मुक्ति चाहती है। जड़ता का स्वभाव है यथास्थिति, अर्थात जो जैसा है वैसा ही रहे। चेतना हर वस्तु में नए-नए रूपों का संधान करती है।

जड़ता पाषाण का गुण है। यदि किसी तक्षक की चेतना उस पाषाण की जड़ता में तथागत की करुण मूर्ति देखने में सक्षम है तो उसकी चेतना पाषाण की जड़ता का विरोध करेगी और वो उसकी अनगढ़ता को बुद्ध के स्वरूप में गढ़ देगा। यदि वो जड़ पाषाण शिल्पी के हाथ न लगा तो अपनी जड़ता में स्थिर रहेगा। स्थिरता ही उसका गुण है। किंतु चेतना यथास्थितिवादी नहीं होती। उसे परिवर्तन चाहिए, नवीनता चाहिए, मुक्तिबोध के शब्दों में – ‘जो है उससे बेहतर चाहिए।’

जड़ता की स्थिति में कोई तरंग नहीं होती,कोई हलचल,कोई संवेदना नहीं होती। तरंगें चेतनावस्था में उठती हैं- सुख-दुखात्मक तरंगें। हममें चेतना है, अतः हम सुखी होते हैं तो सुख के अतिरेक में नाचने लगते हैं और दुखी होते हैं तो दुख की अतिशयता में विध्वंश मचाने लगते हैं। कुछ करना हमारा गुण है क्योंकि हममें चेतना है। चेतना यथास्थितिवाद को स्वीकार नहीं करती। उससे विद्रोह करती है। उसके इस विद्रोह से परिवर्तन होता है। जब हम कहते हैं कि परिवर्तन संसार का नियम तो वास्तव में बड़ी गहरी बात कह रहे होते हैं। भले ही हमें इसका आभास न हो।

हम जिसे कला कहते हैं वह भी हमारी चेतना का ही प्रसाद है। हमारी चेतना ही नाना पदार्थों की जड़ता में विभिन्न रूपाकृतियों का संधान करती है तथा उन्हें अभिव्यक्त करती है। यह अभिव्यक्ति जिसे हम कला कहते हैं वास्तव में जड़ता के प्रति विद्रोह ही है। पाषाण की जड़ता से एक तक्षक विद्रोह करता है। कागज के सपाट धरातल को एक चित्रकार की चेतना स्वीकार नहीं कर पाती। उससे विद्रोह करती है। उस चित्रकार की चेतना का विद्रोह ही चित्र के रूप में साकार होता है। कवि शब्दों की जड़ता से विद्रोह करता है। उसकी चेतना भाषा की जड़ता को स्वीकार नहीं करती, नाही वो शब्दों के रूढ़ अर्थ को स्वीकार करता है। वो उन्हीं थोड़े से शब्दों से नवीन भावों की अभिव्यक्ति के लिए जूझता है। उन शब्दों को नए अर्थ देता है, नए संदर्भ देता है, उन्हें तोड़ता-मरोड़ता है- प्रभापूर्य, तमस्तूर्य लिखता है। वह पुराने शब्दों से उकता जाता है तो नए शब्द लाता है, नए प्रतीक गढ़ता है, नए प्रयोग करता है। उकताना चेतना का गुण है। उससे परिवर्तन संभव हो पाता है। परिवर्तन संसार का मूलभूत नियम है। यह कला का भी मूलभूत गुण है। कला किसी वस्तु को परिवर्तित करती है, संशोधित करती है, सँवारती-निखारती है। किसी वस्तु को यथास्थिति छोड़ देना कला का स्वभाव नहीं है। कला परिवर्तन लाती है। वह पत्थर को परिवर्तित करती है मूर्ति में, कागज को चित्र में तथा शुष्क-नीरस शब्दों को सुंदर कविता में। कला परिवर्तित करती है क्योंकि उसकी पृष्ठभूमि में चेतना सक्रिय होती है। जहाँ चेतना है वहीं कला है। और चेतना का स्वभाव है परिवर्तन।

यह समस्त सृष्टि ही एक कलाकार की रचना के समान है। क्योंकि यह भी जड़ता से विद्रोह का ही प्रतिफल है। पहले संकेत किया गया कि परिवर्तन संसार का नियम है। यह वास्तव में बहुत गूढ़ बात है जिसे हम बड़े हल्के में कह जाते हैं। हमारे उपनिषदों में बताया गया है कि सृष्टि के प्रारंभ में जो भी था वो ना तो जल था, ना स्थल, नाही अनल। वह इन सब से परे था। पर वह अपनी अक्रिय स्थिरता से, जड़ता से उकता गया और उसने कामना कि ‘मैं एक हूँ अनेक हो जाऊँ’- ‘एकोऽहम् बहुस्याम:’। और उस रूपहीन ने स्वयं को ही नाना नाम-रूपात्मक जगत के रूप में प्रकट किया। इस प्रकार जड़ता से विद्रोह के रूप में ही सृष्टि का आरंभ हुआ। एक ललित रचना के समान ही। यह सब हुआ क्योंकि ब्रह्म जड़ स्थिरता से उकता गया। उसने परिवर्तन की कामना की और सिंगुलैरिटी से प्लुरालिटी में बदल गया- एक था अनेक हो गया।

‘बिग बैंग थियरी’ भी कहती है कि महास्फोट से पूर्व ना समय था, ना अंतरिक्ष था। उस समय केवल एक आणविक इकाई का अस्तित्व था जिसमें विस्फोट हुआ और विस्तार हुआ। यह सृष्टि उसी विस्तार का परिणाम है। सिंगुलैरिटी प्लुरालिटी में बदल गई….. ‘एकोऽहम् बहुस्याम:’

परिवर्तन हमेशा रम्य ही नहीं होता। वह घोर भी हो सकता है। शिव के ताण्डव के समान। ताण्डव जड़ता से विशुद्ध विद्रोह है। उसका कोई उद्देश्य नहीं है। उसका एकमात्र उद्देश्य है परिवर्तन। ताण्डव मुक्ति है। उसमें कोई बंधन नहीं है, कोई जकड़न नहीं है। वह समस्त बंधनों से, समस्त जकड़नों से विद्रोह है, संघर्ष है, मुक्ति है। यह मुक्ति सबके लिए संभव नहीं है। शिव की बात और है। वे शक्तिपति हैं, शक्तिमान हैं, पूर्ण हैं। मनुष्य का सत्य मात्र विद्रोह है। वह छटपटा सकता है, अकुला सकता है, उकता भी सकता है परंतु मुक्ति शिव की इच्छा पर निर्भर है। लेकिन मनुष्य का विद्रोह उसकी अकुलाहट में ही है, उसकी छटपटाहट में ही है। वही उसके हाथ में है अतः वही उसका ठोस सत्य है।

इस सृष्टि में सनातन काल से ही एक द्वंद्व चल रहा है। जड़ता और चेतनता का द्वंद्व। इन दोनों शक्तियों का द्वंद्व नाना रूपों में इस जगत के प्रत्येक क्रिया-व्यापार को प्रभावित कर रहा है। इस द्वंद्व के कारण ही सृष्टि गतिमान है। सृष्टि में जो भी सुंदर है या सुंदर बनता है इस द्वंद्व के कारण ही बनता है। यह द्वंद्व छंद में है- यति-गति के रूप में, संगीत में है- ताल के रूप में, हमारे जीवन में है स्थिरता और परिवर्तन के रूप में। इस प्रकार यह द्वंद्व प्रत्येक क्षेत्र में चलता रहता है।

सृष्टि में जड़ता और चेतनता दोनों का अपना महत्व है। परंतु चेतना का विशेष महत्व है, वही परिवर्तन लाती है। परिवर्तन ही संसार का नियम है। अनादि काल तक जड़ रूप में रहते-रहते जब ब्रह्म में चेतना सक्रिय हुई तब उसने इच्छा प्रकट की- ‘एकोऽहम् बहुस्याम:’ । उसकी इच्छा ही यह सृष्टि है। यह सृष्टि चैतन्य प्राणियों की आश्रयस्थली है। हम चैतन्य प्राणी है अर्थात हममें चेतना है और चेतना का स्वभाव है कि वह जड़ता से विद्रोह करती है। अतः हम भी जड़ता से विद्रोह करते हैं। हम नाचते हैं, गाते हैं, चित्र बनाते हैं, कविता लिखते हैं। यह सब उसी विद्रोह के रूप हैं। हम उड़ना चाहते हैं, हम नदी के समान बहना चाहते हैं, हम पर्वतों पर चढ़ना चाहते हैं। यह चाहत, यह इच्छा चेतना का गुण है। चेतना जड़ता से ऊब जाती है। यदि हममें विद्रोह है मतलब हममें चेतना भी है। चेतना यथास्थितिवाद नहीं झेल सकती। उसे परिवर्तन चाहिए। वो शुभ-अशुभ, अच्छा-बुरा जैसा भी हो। क्योंकि कुछ ना होने से कुछ होना बेहतर है। ‘जो है उससे बेहतर चाहिए….’, परिवर्तन चाहिए। परिवर्तन संसार का नियम है और यह चेतना के बिना संभव नहीं है।

(यह लेखक के निजी विचार है)

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