चन्द्रशेखर: राष्ट्रीय विवेक की अभिव्यक्ति
प्रशांत बलियाकभी लार्ड मार्ले ने गाँधी जी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले का मूल्यांकन करते हुए कहा था कि -"उनका मस्तिष्क एक...
एफ.आई.आर (FIR) से जुड़े क़ानूनी दांवपेंच
अंजना शर्मादंड प्रक्रिया संहिता 1898 सन 1973 तक लागू थी,इसे अंततः दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 द्वारा निरस्त कर दिया गया था। हालांकि, आपराधिक...
मानव नहीं परपीड़क हैं हम
महेंद्र पाण्डेयअकारण ही केरल में गर्भवती हथिनी को क्रूरतम तरीके से मार डाला गया। मारने वाले मनुष्य देह धारी प्राणी थे। प्रश्न यह...
कोरोना संकट के बीच कानूनी पेशे में परिवर्तन और चुनौतियां
अंजना शर्माआज हमारा देश ही नहीं बल्कि पूरा विश्व इस कोरोना महामारी की चपेट में आ चुका है। इस महामारी के प्रकोप से...
मोदी की विश्वसनीयता बनाम विस्मृत विपक्ष के एक वर्ष
पतंजलि पाण्डेयनरेंद्र मोदी की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का पहला वर्ष पूरा कर लिया है। पिछले वर्ष इसी मास भारतीय राजनीति में...
सावरकर के “कथित माफीनामे’ पर एक विनम्र निवेदन..
सुमंत भट्टाचार्यजिन्हें ब्रिटिश कानून व्यवस्था की तनिक भी समझ है वो जानते हैं, सावरकर जी का "माफीनामा" बर्तानवी हुकूमत का एक "सेट फॉर्मेट"...
सावरकर जयंती पर बीएचयू और जेएनयू की घटना का स्मरण
अनिमेष मिश्राकुछ दशक पहले शायद यह उम्मीद करना भी मुश्किल था कि सावरकर की जंयती पर भारत के प्रधानमंत्री उनके योगदान को याद करेंगे...
शास्त्रविरहित धर्म और आत्महन्ता आस्थाओं के बीच
आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण
"मत कहो आकाश में...
श्रम संहिता: इसमें निहित समस्याएँ एवं व्यापक परिवर्तन
राहुल मिश्राकिसी भी देश की आर्थिक प्रगति के लिये उद्योगों का विकास होना आवश्यक है विशेषकर विनिर्माण क्षेत्र में, जो अन्य क्षेत्रों की...
जड़ता बनाम चैतन्यता
अभिषेक पाण्डेय'जड़ता है जीवन की पीड़ा
निस-तरंग पाषाणी क्रीड़ा'जड़ता में स्थिरता है, चैतन्य उसका विरोधी गुण है जो जड़ता के प्रति विद्रोह है।...
























